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SHRI DURGA SAPTSHATI

श्रीदुर्गामानस-पूजा

SRI DURGA MANAS PUJA (Page 3)

Verse 17 स्वर्गाङ्गणे वेणुमृदङ्गशङ्खभेरीनिनादैरुपगीयमाना।

कोलाहलैराकलिता तवास्तु विद्याधरीनृत्यकला सुखाय ॥17॥
स्वर्गके आँगनमें वेणु, मृदङ्ग, शङ्ख तथा भेरीकी मधुर ध्वनिके साथ जो संगीत होता है तथा जिसमें अनेक प्रकारके कोलाहलका शब्द व्याप्त रहता है, वह विद्याधरीद्वारा प्रदर्शित नृत्य - कला तुम्हारे सुखकी वृद्धि करे
Verse 18 देवि भक्तिरसभावितवृत्ते प्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते।

तत्र लौल्यमपि सत्फलमेकं जन्मकोटिभिरपीह न लभ्यम् ॥18॥
देवि! तुम्हारे भक्तिरससे भावित इस पद्यमय स्तोत्रमें यदि कहींसे भी कुछ भक्तिका लेश मिले तो उसीसे प्रसन्न हो जाओ। माँ! तुम्हारी भक्तिके लिये चित्तमें जो आकुलता होती है, वही एकमात्र जीवनका फल है, वह कोटि-कोटि जन्म धारण करनेपर भी इस संसारमें तुम्हारी कृपाके बिना सुलभ नहीं होती
Verse 19 एतैः षोडशभिः पद्यैरुपचारोपकल्पितैः।

यः परां देवतां स्तौति स तेषां फलमाप्नुयात् ॥19॥
इन उपचारकल्पित सोलह पद्योंसे जो परा देवता भगवती त्रिपुरसुन्दरीका स्तवन करता है, वह उन उपचारोंके समर्पणका फल प्राप्त करता है
॥ इति दुर्गातन्त्रे दुर्गामानसपूजा समाप्ता ॥

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