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SHRI DURGA SAPTSHATI

ऋग्वेदोक्तं देवीसूक्तम्

RIGVEDOKTAM DEVI SUKTAM (Page 2)

Verse 7 अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे।

ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वो-तामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ॥7॥
मैं ही इस जगत्‌के पितारूप आकाशको सर्वाधिष्ठानस्वरूप परमात्माके ऊपर उत्पन्न करती हूँ। समुद्र- (सम्पूर्ण भूतोंके उत्पत्तिस्थान परमात्मा -) में तथा जल - (बुद्धिकी व्यापक वृत्तियों -) में मेरे कारण - ( कारणस्वरूप चैतन्य ब्रह्म-) की स्थिति है; अतएव मैं समस्त भुवनमें व्याप्त रहती हूँ तथा उस स्वर्गलोकका भी अपने शरीरसे स्पर्श करती हूँ
Verse 8 अहमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा।

परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव* ॥8॥
मैं कारणरूपसे जब समस्त विश्वकी रचना आरम्भ करती हूँ, तब दूसरोंकी प्रेरणाके बिना स्वयं ही वायुकी भाँति चलती हूँ, स्वेच्छासे ही कर्ममें प्रवृत्त होती हूँ। मैं पृथ्वी और आकाश दोनोंसे परे हूँ। अपनी महिमासे ही मैं ऐसी हुई हूँ
॥ इति ऋग्वेदोक्तं देवीसूक्तम् समाप्तं ॥

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