॥ अथ तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् ॥
ॐ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥1॥
ॐ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥1॥
ब्रह्मोवाच
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥2॥
॥ इति रात्रिसूक्तम् ॥
अथ तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम्
जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेजःस्वरुप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रा देवी की भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे
ब्रह्मा जी ने कहा - देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्ही स्वधा और तुम्ही वषट्कार हो। स्वर
भी तुम्हारे ही स्वरुप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में अकार,
उकार, मकार - इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो ॥2॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥2॥
॥ इति रात्रिसूक्तम् ॥
अथ तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम्
जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेजःस्वरुप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रा देवी की भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे
ब्रह्मा जी ने कहा - देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्ही स्वधा और तुम्ही वषट्कार हो। स्वर
भी तुम्हारे ही स्वरुप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में अकार,
उकार, मकार - इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो ॥2॥
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ॥3॥
इन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रुप से उच्चारण नहीं
किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्ही संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो ॥3॥
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ॥3॥
इन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रुप से उच्चारण नहीं
किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्ही संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो ॥3॥
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥4॥
देवि! तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत की सृष्टि होती
है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्त में
सबको अपना ग्रास बना लेती हो ॥4॥
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥4॥
देवि! तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत की सृष्टि होती
है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्त में
सबको अपना ग्रास बना लेती हो ॥4॥
विसृष्टौ सृष्टिरुपा त्वं स्थितिरूपा च पालने।
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥5॥
जगन्मयी देवि! इस जगत की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालनकाल में
स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करने वाली हो ॥5॥
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥5॥
जगन्मयी देवि! इस जगत की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालनकाल में
स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करने वाली हो ॥5॥
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः।
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ॥6॥
तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा,
महादेवी और महासुरी हो ॥6॥
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ॥6॥
तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा,
महादेवी और महासुरी हो ॥6॥
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥7॥
तुम्हीं तीनो गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो।
भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो ॥7॥
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥7॥
तुम्हीं तीनो गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो।
भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो ॥7॥
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥8॥
तुम्हीं श्री, तुम्ही ईश्वरी, तुम्ही ह्री और तुम्ही बोधस्वरुपा बुद्धि हो।
लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो ॥8॥
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥8॥
तुम्हीं श्री, तुम्ही ईश्वरी, तुम्ही ह्री और तुम्ही बोधस्वरुपा बुद्धि हो।
लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो ॥8॥