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SHRI DURGA SAPTSHATI

अथार्गलास्तोत्रम्

ATHARGALASTOTRAM (Page 3)

Verse 17 प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥17॥
प्रचण्ड दैत्यों के दर्प का दलन करने वाली चण्डिके! मुझ शरणागत को रूप
दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो
Verse 18 चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥18॥
चतुर्मुख ब्रह्माजी के द्वारा प्रशन्सित चार भुजाधारिणी परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय
दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो
Verse 19 कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥19॥
देवि अम्बिके! भगवान् विष्णु नित्य-निरन्तर भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम रूप
दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो
Verse 20 हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥20॥
हिमालय - कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा प्रशन्सित होने वाली परमेश्वरि! तुम
रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो
Verse 21 इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥21॥
शचीपति इन्द्र के द्वारा सद्भाव से पूजित होने वाली परमेश्वरि! तुम रूप दो,
जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो
Verse 22 देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥22॥
प्रचण्ड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमण्ड चूर करने वाली देवि! तुम रूप दो,
जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो
Verse 23 देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥23॥
देवि अम्बिके! तुम अपने भक्तजनों को सदा असीम आनन्द प्रदान करती रहती हो। मुझे
रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो
Verse 24 पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।

तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥24॥
मन की इच्छा के अनुसार चलने वाली मनोहर पत्नी प्रदान करो, जो दुर्गम
संसार-सागर से तारने वाली तथा उत्तम कुल में उत्पन्न हुयी हो

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