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SHRI DURGA SAPTSHATI

देवी अथर्वशीर्षम्

DEVI ATHARVASHIRSHAM (Page 2)

Verse 9 तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तींवैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम्।

दुर्गां देवीं शरणंप्रपद्यामहेऽसुरान्नाशयित्र्यै ते नमः ॥9॥
उस अग्निके-से वर्णवाली, ज्ञान से जगमगाने वाली दीप्तिमती, कर्म फल प्राप्ति के हेतु सेवन की जाने वाली दुर्गा देवी की हम शरण में हैं। असुरों का नाश करने वाली देवि! तुम्हें नमस्कार है
Verse 10 देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति।

सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥10॥
प्राण रूप देवों ने जिस प्रकाशमान वैखरी वाणी को उत्पन्न किया, उसे अनेक प्रकार के प्राणी बोलते है। वह कामधेनु तुल्य आनन्दायक और अन्न तथा बल देने वाली वाग् रूपिणी भगवती उत्तम स्तुति से सन्तुष्ट होकर हमारे समीप आये
Verse 11 कालरात्रीं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम्।

सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥11॥
काल का भी नाश करने वाली, वेदों द्वारा स्तुत हुई विष्णुशक्ति, स्कन्दमाता (शिवशक्ति), सरस्वती (ब्रह्मशक्ति), देवमाता अदिति और दक्षकन्या (सती), पापनाशिनी कल्याणकारिणी भगवती को हम प्रणाम करते हैं
Verse 12 महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि।

तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥12॥
हम महालक्ष्मी को जानते हैं और उन सर्वशक्तिरूपिणी का ही ध्यान करते है। वह देवी हमें उस विषय में (ज्ञान-ध्यान में) प्रवृत करें
Verse 13 अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव।

तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः ॥13॥
हे दक्ष! आपकी जो कन्या अदिति हैं, वे प्रसूता हुई और उनके मृत्युरहित कल्याणमय देव उत्पन्न हुये
Verse 14 कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः।

पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्यैषा विश्वमातादिविद्योम् ॥14॥
काम (क), योनि (ए), कमला (ई), वज्रपाणि-इन्द्र (ल), गुहा (ह्रीं), ह, स-वर्ण, मातरिश्वा-वायु (क), अभ्र (ह), इन्द्र (ल), पुनः गुहा (ह्रीं), स, क, ल-वर्ण और माया (ह्रीं)- यह सर्वात्मिका जगन्माता की मूल विद्या है और वह ब्रह्मरूपिणी है
Verse 15 एषाऽऽत्मशक्तिः। एषा विश्वमोहिनी। पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा।

एषा श्रीमहाविद्या। य एवं वेद स शोकं तरति ॥15॥
ये परमात्मा की शक्ति हैं। ये विश्वमोहिनी हैं। पाश, अङ्कुश, धनुष और बाण धारण करने वाली हैं। ये 'श्रीमहाविद्या' हैं। जो ऐसा जानता है, वह शोक को पार कर जाता है
Verse 16 नमस्ते अस्तु भगवतिमातरस्मान् पाहि सर्वतः ॥16॥
भगवती! तुम्हें नमस्कार है। माता! सब प्रकार से हमारी रक्षा करो

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