Verse 17
सैषाष्टौ वसवः। सैषैकादश रुद्राः।सैषा द्वादशादित्याः।
सैषा विश्वेदेवाःसोमपा असोमपाश्च।
सैषा यातुधाना असुरारक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः।
सैषा सत्त्वरजस्तमांसि।सैषा ब्रह्मविष्णुरुद्ररूपिणी।
सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः।सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि।
कलाकाष्ठादिकालरूपिणी।तामहं प्रणौमि नित्यम्॥
पापापहारिणीं देवींभुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम्।
अनन्तां विजयां शुद्धांशरण्यां शिवदां शिवाम् ॥17॥
सैषा विश्वेदेवाःसोमपा असोमपाश्च।
सैषा यातुधाना असुरारक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः।
सैषा सत्त्वरजस्तमांसि।सैषा ब्रह्मविष्णुरुद्ररूपिणी।
सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः।सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि।
कलाकाष्ठादिकालरूपिणी।तामहं प्रणौमि नित्यम्॥
पापापहारिणीं देवींभुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम्।
अनन्तां विजयां शुद्धांशरण्यां शिवदां शिवाम् ॥17॥
(मन्त्रद्रष्टा ऋषि कहते हैं -) वही ये अष्ट वसु हैं; वही ये एकादश रुद्र हैं; वही ये द्वादश आदित्य हैं; वही ये सोमपान करने वाले और सोमपान न करने वाले विश्वदेव हैं; वही ये यातुधान (एक प्रकार के राक्षस), असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्धि हैं; वही ये सत्व-रज-तम हैं; वही ये ब्रह्म-विष्णु-रूद्ररूपिणी हैं; वही ये प्रजापति-इन्द्र-मनु हैं; वही ये ग्रह, नक्षत्र और तारे हैं; वही कला-काष्ठादि कालरूपिणी हैं; उन पाप नाश करने वाली, भोग-मोक्ष देने वाली, अन्तरहित, विजयाधिष्ठात्री, निर्दोष, शरण लेने योग्य, कल्याणदात्री और मङ्गलरूपिणी देवी को हम सदा प्रणाम करते हैं
Verse 18
वियदीकारसंयुक्तंवीतिहोत्रसमन्वितम्।
अर्धेन्दुलसितं देव्याबीजं सर्वार्थसाधकम् ॥18॥
अर्धेन्दुलसितं देव्याबीजं सर्वार्थसाधकम् ॥18॥
वियत्-आकाश (ह) तथा 'ई' कार से युक्त, वीतिहोत्र-अग्नि (र)-सहित, अर्धचन्द्र (ँ)-से अलंकृत जो देवी का बीज है, वह सब मनोरथ पूर्ण करने वाला है। इस प्रकार इस एकाक्षर ब्रह्म (ह्रीं)- का ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जो निरतिशयानन्दपूर्ण और ज्ञान के सागर हैं। (यह मन्त्र देवी प्रणव माना जाता है। ॐकार के समान ही यह प्रणव भी व्यापक अर्थ से भरा हुआ है। संक्षेप में इसका अर्थ इच्छा-ज्ञान क्रियाधार, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द, समरसीभूत, शिवशक्ति स्फुरण है।)
Verse 19
एवमेकाक्षरं ब्रह्मयतयः शुद्धचेतसः।
ध्यायन्ति परमानन्दमयाज्ञानाम्बुराशयः ॥19॥
ध्यायन्ति परमानन्दमयाज्ञानाम्बुराशयः ॥19॥
वियत्-आकाश (ह) तथा 'ई' कार से युक्त, वीतिहोत्र-अग्नि (र)-सहित, अर्धचन्द्र (ँ)-से अलंकृत जो देवी का बीज है, वह सब मनोरथ पूर्ण करने वाला है। इस प्रकार इस एकाक्षर ब्रह्म (ह्रीं)- का ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जो निरतिशयानन्दपूर्ण और ज्ञान के सागर हैं। (यह मन्त्र देवी प्रणव माना जाता है। ॐकार के समान ही यह प्रणव भी व्यापक अर्थ से भरा हुआ है। संक्षेप में इसका अर्थ इच्छा-ज्ञान क्रियाधार, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द, समरसीभूत, शिवशक्ति स्फुरण है।)
Verse 20
वाङ्माया ब्रह्मसूस्तस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम्।
सूर्योऽवामश्रोत्रबिन्दुसंयुक्तष्टात्तृतीयकः।
नारायणेन सम्मिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः।
विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ॥20॥
सूर्योऽवामश्रोत्रबिन्दुसंयुक्तष्टात्तृतीयकः।
नारायणेन सम्मिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः।
विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ॥20॥
वाणी (ऐं), माया (ह्रीं), ब्रह्मसू-काम (क्लीं), इसके आगे छठा व्यंजन अर्थात् च, वही वक्त्र अर्थात् आकारसे युक्त (चा), सूर्य (म), 'अवाम श्रोत्र'- दक्षिण कर्ण (उ) और बिन्दु अर्थात् अनुस्वार से युक्त (मुं), टकार से तीसरा ड, वही नारायण अर्थात् 'आ' से मिश्र (डा), वायु (य), वही अधर अर्थात् 'ऐ' से युक्त (यै) और 'विच्चे' यह नवार्ण मन्त्र उपासकों को आनन्द और ब्रह्मसायुज्य देने वाला है
Verse 21
हृत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम्।
पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम्।
त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ॥21॥
पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम्।
त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ॥21॥
[इस मंत्र का अर्थ है - हे चित्स्वरूपिणी महासरस्वती! हे सद्रूपिणी महालक्ष्मी! हे आनन्दरूपिणी महाकाली! ब्रह्मविद्या पाने के लिये हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं। हे महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-स्वरूपिणी चण्डिके! तुम्हें नमस्कार है। अविद्यारूप रज्जुकी दृढ़ ग्रंथि को खोलकर मुझे मुक्त करो।]
हृत्कमल के मध्य में रहने वाली, प्रातःकालीन सूर्य के समान प्रभा वाली, पाश और अङ्कुश धारण करने वाली, मनोहर रूप वाली, वरद और अभयमुद्रा धारण किये हुए हाथों वाली, तीन नेत्रों से युक्त, रक्त वस्त्र परिधान करने वाली और कामधेनु के समान भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने वाली देवी को मैं भजता हूँ
हृत्कमल के मध्य में रहने वाली, प्रातःकालीन सूर्य के समान प्रभा वाली, पाश और अङ्कुश धारण करने वाली, मनोहर रूप वाली, वरद और अभयमुद्रा धारण किये हुए हाथों वाली, तीन नेत्रों से युक्त, रक्त वस्त्र परिधान करने वाली और कामधेनु के समान भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने वाली देवी को मैं भजता हूँ
Verse 22
नमामि त्वां महादेवींमहाभयविनाशिनीम्।
महादुर्गप्रशमनींमहाकारुण्यरूपिणीम् ॥22॥
महादुर्गप्रशमनींमहाकारुण्यरूपिणीम् ॥22॥
महाभय का नाश करने वाली, महासंकट को शान्त करने वाली और महान् करूणा की साक्षात् मूर्ति तुम महादेवी को मैं नमस्कार करता हूँ
Verse 23
यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो नजानन्ति तस्मादुच्यते अज्ञेया।
यस्या अन्तो न लभ्यतेतस्मादुच्यते अनन्ता।
यस्या लक्ष्यं नोपलक्ष्यतेतस्मादुच्यते अलक्ष्या।
यस्या जननं नोपलभ्यतेतस्मादुच्यते अजा।
एकैव सर्वत्र वर्ततेतस्मादुच्यते एका।
एकैव विश्वरूपिणीतस्मादुच्यते नैका।
अत एवोच्यतेअज्ञेयानन्तालक्ष्याजैका नैकेति ॥23॥
यस्या अन्तो न लभ्यतेतस्मादुच्यते अनन्ता।
यस्या लक्ष्यं नोपलक्ष्यतेतस्मादुच्यते अलक्ष्या।
यस्या जननं नोपलभ्यतेतस्मादुच्यते अजा।
एकैव सर्वत्र वर्ततेतस्मादुच्यते एका।
एकैव विश्वरूपिणीतस्मादुच्यते नैका।
अत एवोच्यतेअज्ञेयानन्तालक्ष्याजैका नैकेति ॥23॥
जिसका स्वरूप ब्रह्मादिक नहीं जानते - इसलिये जिसे अज्ञेया कहते हैं, जिसका अन्त नहीं मिलता - इसलिये जिसे अनन्ता कहते हैं, जिसका लक्ष्य दीख नहीं पड़ता - इसलिये जिसे अलक्ष्या कहते हैं, जिसका जन्म समझ में नहीं आता - इसलिये जिसे अजा कहते हैं, जो अकेली सर्वत्र है - इसलिये जिसे एका कहते हैं, जो अकेली ही विश्वरूप में सजी हुई है - इसलिये जिसे नैका कहते हैं, वह इसीलिये अज्ञेया, अनन्ता, अलक्ष्या, अजा, एका और नैका कहलाती हैं
Verse 24
मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी।
ज्ञानानां चिन्मयातीता*शून्यानां शून्यसाक्षिणी।
यस्याः परतरं नास्तिसैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ॥24॥
ज्ञानानां चिन्मयातीता*शून्यानां शून्यसाक्षिणी।
यस्याः परतरं नास्तिसैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ॥24॥
सब मन्त्रों में 'मातृका'- मूलाक्षर रूप से रहने वाली, शब्दों में ज्ञान (अर्थ) - रूप से रहने वाली, ज्ञानों में चिन्मयातीता, शून्यों में 'शून्यसाक्षिणी' तथा जिनसे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, वे दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हैं