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SHRI DURGA SAPTSHATI

चतुर्थ अध्याय

CHATURTH ADHYAY (Page 5)

व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम्* ॥32॥

देवताओ! तुम सब लोग मुझसे जिस वस्तुकी अभिलाषा रखते हो, उसे माँगो ॥32॥
देवा ऊचुः ॥33॥

देवता बोले - ॥33॥
भगवत्या कृतं सर्वं न किञ्चिदवशिष्यते ॥34॥

भगवतीने हमारी सब इच्छा पूर्ण कर दी, अब कुछ भी बाकी नहीं है ॥34॥
यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः।

यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि ॥35॥

क्योंकि हमारा यह शत्रु महिषासुर मारा गया। महेश्वरि! इतनेपर भी यदि आप हमें और वर देना चाहती हैं ॥35॥
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः।

यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ॥36॥

तो हम जब-जब आपका स्मरण करें, तब-तब आप दर्शन देकर हमलोगोंके महान् संकट दूर कर दिया करें तथा प्रसन्नमुखी अम्बिके! जो मनुष्य इन स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करे, उसे वित्त, समृद्धि और वैभव देनेके साथ ही उसकी धन और स्त्री आदि सम्पत्तिको भी बढ़ानेके लिये आप सदा हमपर प्रसन्न रहें ॥36-37॥
तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम्।

वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥37॥

तो हम जब-जब आपका स्मरण करें, तब-तब आप दर्शन देकर हमलोगोंके महान् संकट दूर कर दिया करें तथा प्रसन्नमुखी अम्बिके! जो मनुष्य इन स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करे, उसे वित्त, समृद्धि और वैभव देनेके साथ ही उसकी धन और स्त्री आदि सम्पत्तिको भी बढ़ानेके लिये आप सदा हमपर प्रसन्न रहें ॥36-37॥
ऋषिरुवाच ॥38॥

ऋषि कहते हैं - ॥38॥
इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽऽत्मनः।

तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥39॥

राजन्! देवताओंने जब अपने तथा जगत् के कल्याणके लिये भद्रकाली देवीको इस प्रकार प्रसन्न किया, तब वे 'तथास्तु' कहकर वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥39॥

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