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SHRI DURGA SAPTSHATI

चतुर्थ अध्याय

CHATURTH ADHYAY (Page 6)

इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा।

देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी ॥40॥

भूपाल! इस प्रकार पूर्वकालमें तीनों लोकोंका हित चाहनेवाली देवी जिस प्रकार देवताओंके शरीरोंसे प्रकट हुई थीं, वह सब कथा मैंने कह सुनायी ॥40॥
पुनश्च गौरीदेहात्सा* समुद्भूता यथाभवत्।

वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥41॥

अब पुनः देवताओंका उपकार करनेवाली वे देवी दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ-निशुम्भका वध करने एवं सब लोकों की रक्षा करनेके लिये गौरीदेवीके शरीरसे जिस प्रकार प्रकट हुई थीं, वह सब प्रसङ्ग मेरे मुँहसे सुनो। मैं उसका तुमसे यथावत् वर्णन करता हूँ ॥41-42॥
रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी।

तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥ह्रीं ॐ ॥42॥

अब पुनः देवताओंका उपकार करनेवाली वे देवी दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ-निशुम्भका वध करने एवं सब लोकों की रक्षा करनेके लिये गौरीदेवीके शरीरसे जिस प्रकार प्रकट हुई थीं, वह सब प्रसङ्ग मेरे मुँहसे सुनो। मैं उसका तुमसे यथावत् वर्णन करता हूँ ॥41-42॥

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