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SHRI DURGA SAPTSHATI

षष्ठ अध्याय

SHASHTH ADHYAY (Page 2)

स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम्।

जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः ॥8॥

वहाँ पहुँचकर उसने हिमालयपर रहनेवाली देवीको देखा और ललकारकर कहा- 'अरी! तू शुम्भ-निशुम्भके पास चल। यदि इस समय प्रसन्नतापूर्वक मेरे स्वामीके समीप नहीं चलेगी तो मैं बलपूर्वक झोंटा पकड़कर घसीटते हुए तुझे ले चलूँगा' ॥8-9॥
न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति।

ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम् ॥9॥

वहाँ पहुँचकर उसने हिमालयपर रहनेवाली देवीको देखा और ललकारकर कहा- 'अरी! तू शुम्भ-निशुम्भके पास चल। यदि इस समय प्रसन्नतापूर्वक मेरे स्वामीके समीप नहीं चलेगी तो मैं बलपूर्वक झोंटा पकड़कर घसीटते हुए तुझे ले चलूँगा' ॥8-9॥
देव्युवाच ॥10॥

देवी बोलीं - ॥10॥
दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः।

बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम् ॥11॥

तुम्हें दैत्योंके राजाने भेजा है, तुम स्वयं भी बलवान् हो और तुम्हारे साथ विशाल सेना भी है; ऐसी दशामें यदि मुझे बलपूर्वक ले चलोगे तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ? ॥11॥
ऋषिरुवाच ॥12॥

ऋषि कहते हैं - ॥12॥
इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः।

हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः ॥13॥

देवीके यों कहनेपर असुर धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ा, तब अम्बिकाने 'हुं' शब्दके उच्चारणमात्रसे उसे भस्म कर दिया ॥13॥
अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका*।

ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः ॥14॥

फिर तो क्रोधमें भरी हुई दैत्योंकी विशाल सेना और अम्बिकाने एक-दूसरेपर तीखे सायकों, शक्तियों तथा फरसोंकी वर्षा आरम्भ की ॥14॥
ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम्।

पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः ॥15॥

इतनेमें ही देवीका वाहन सिंह क्रोधमें भरकर भयंकर गर्जना करके गर्दनके बालोंको हिलाता हुआ असुरोंकी सेनामें कूद पड़ा ॥15॥

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