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SHRI DURGA SAPTSHATI

वैकृतिकं रहस्यम्

VAIKRUTIKAM RAHASYAM (Page 3)

Verse 17 इत्युक्तानि स्वरूपाणि मूर्तीनां तव पार्थिव।

उपासनं जगन्मातुः पृथगासां निशामय ॥17॥
राजन्! इस प्रकार तुमसे महाकाली आदि तीनों मूर्तियोंके स्वरूप बतलाये, अब जगन्माता महालक्ष्मीकी तथा इन महाकाली आदि तीनों मूर्तियोंकी पृथक्-पृथक् उपासना श्रवण करो
Verse 18 महालक्ष्मीर्यदा पूज्या महाकाली सरस्वती।

दक्षिणोत्तरयोः पूज्ये पृष्ठतो मिथुनत्रयम् ॥18॥
जब महालक्ष्मीकी पूजा करनी हो, तब उन्हें मध्यमें स्थापित करके उनके दक्षिण और वामभागमें क्रमशः महाकाली और महासरस्वतीका पूजन करना चाहिये और पृष्ठभागमें तीनों युगल देवताओंकी पूजा करनी चाहिये
Verse 19 विरञ्चिः स्वरया मध्ये रुद्रो गौर्या च दक्षिणे।

वामे लक्ष्म्या हृषीकेशः पुरतो देवतात्रयम् ॥19॥
महालक्ष्मीके ठीक पीछे मध्यभागमें सरस्वती के साथ ब्रह्मा का पूजन करे। उनके दक्षिणभागमें गौरीके साथ रुद्रकी पूजा करे तथा वामभागमें लक्ष्मीसहित विष्णुका पूजन करे। महालक्ष्मी आदि तीनों देवियोंके सामने निम्नाङ्कित तीन देवियोंकी भी पूजा करनी चाहिये
Verse 20 अष्टादशभुजा मध्ये वामे चास्या दशानना।

दक्षिणेऽष्टभुजा लक्ष्मीर्महतीति समर्चयेत् ॥20॥
मध्यस्थ महालक्ष्मीके आगे मध्यभागमें अठारह भुजाओंवाली महालक्ष्मीका पूजन करे। उनके वामभागमें दस मुखोंवाली महाकालीका तथा दक्षिणभागमें आठ भुजाओंवाली महासरस्वतीका पूजन करे
Verse 21 अष्टादशभुजा चैषा यदा पूज्या नराधिप।

दशानना चाष्टभुजा दक्षिणोत्तरयोस्तदा ॥21॥
राजन्! जब केवल अठारह भुजाओंवाली महालक्ष्मीका अथवा दशमुखी कालीका या अष्टभुजा सरस्वतीका पूजन करना हो, तब सब अरिष्टोंकी शान्तिके लिये इनके दक्षिणभागमें कालकी और वामभागमें मृत्युकी भी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। जब शुम्भासुरका संहार करनेवाली अष्टभुजादेवीकी पूजा करनी हो, तब उनके साथ उनकी नौ शक्तियोंका और दक्षिणभागमें रुद्र एवं वामभागमें गणेशजीका भी पूजन करना चाहिये (ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती तथा चामुण्डा - ये नौ शक्तियाँ हैं)। 'नमो देव्यै...' इस स्तोत्रसे महालक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये
Verse 22 कालमृत्यू च सम्पूज्यौ सर्वारिष्टप्रशान्तये।

यदा चाष्टभुजा पूज्या शुम्भासुरनिबर्हिणी ॥22॥
राजन्! जब केवल अठारह भुजाओंवाली महालक्ष्मीका अथवा दशमुखी कालीका या अष्टभुजा सरस्वतीका पूजन करना हो, तब सब अरिष्टोंकी शान्तिके लिये इनके दक्षिणभागमें कालकी और वामभागमें मृत्युकी भी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। जब शुम्भासुरका संहार करनेवाली अष्टभुजादेवीकी पूजा करनी हो, तब उनके साथ उनकी नौ शक्तियोंका और दक्षिणभागमें रुद्र एवं वामभागमें गणेशजीका भी पूजन करना चाहिये (ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती तथा चामुण्डा - ये नौ शक्तियाँ हैं)। 'नमो देव्यै...' इस स्तोत्रसे महालक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये
Verse 23 नवास्याः शक्तयः पूज्यास्तदा रुद्रविनायकौ।

नमो देव्या इति स्तोत्रैर्महालक्ष्मीं समर्चयेत् ॥23॥
राजन्! जब केवल अठारह भुजाओंवाली महालक्ष्मीका अथवा दशमुखी कालीका या अष्टभुजा सरस्वतीका पूजन करना हो, तब सब अरिष्टोंकी शान्तिके लिये इनके दक्षिणभागमें कालकी और वामभागमें मृत्युकी भी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। जब शुम्भासुरका संहार करनेवाली अष्टभुजादेवीकी पूजा करनी हो, तब उनके साथ उनकी नौ शक्तियोंका और दक्षिणभागमें रुद्र एवं वामभागमें गणेशजीका भी पूजन करना चाहिये (ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती तथा चामुण्डा - ये नौ शक्तियाँ हैं)। 'नमो देव्यै...' इस स्तोत्रसे महालक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये
Verse 24 अवतारत्रयार्चायां स्तोत्रमन्त्रास्तदाश्रयाः।

अष्टादशभुजा चैषा पूज्या महिषमर्दिनी ॥24॥
तथा उनके तीन अवतारोंकी पूजाके समय उनके चरित्रोंमें जो स्तोत्र और मन्त्र आये हैं, उन्हींका उपयोग करना चाहिये। अठारह भुजाओंवाली महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी ही विशेषरूपसे पूजनीय हैं; क्योंकि वे ही महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती कहलाती हैं। वे ही पुण्य-पापोंकी अधीश्वरी तथा सम्पूर्ण लोकोंकी महेश्वरी हैं

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