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SHRI DURGA SAPTSHATI

वैकृतिकं रहस्यम्

VAIKRUTIKAM RAHASYAM (Page 1)

Verse 1 ॥ अथ वैकृतिकं रहस्यम् ॥
ऋषिरुवाच
ॐ त्रिगुणा तामसी देवी सात्त्विकी या त्रिधोदिता।

सा शर्वा चण्डिका दुर्गा भद्रा भगवतीर्यते ॥1॥
॥ अथ वैकृतिक रहस्य ॥
ऋषि कहते हैं - राजन्! पहले जिन सत्त्वप्रधाना त्रिगुणमयी महालक्ष्मी के तामसी आदि भेदसे तीन स्वरूप बतलाये गये, वे ही शर्वा, चण्डिका, दुर्गा, भद्रा और भगवती आदि अनेक नामोंसे कही जाती हैं
Verse 2 योगनिद्रा हरेरुक्ता महाकाली तमोगुणा।

मधुकैटभनाशार्थं यां तुष्टावाम्बुजासनः ॥2॥
तमोगुणमयी महाकाली भगवान् विष्णुकी योगनिद्रा कही गयी हैं। मधु और कैटभका नाश करनेके लिये ब्रह्माजीने जिनकी स्तुति की थी, उन्हींका नाम महाकाली है
Verse 3 दशवक्त्रा दशभुजा दशपादाञ्जनप्रभा।

विशालया राजमाना त्रिंशल्लोचनमालया ॥3॥
उनके दस मुख, दस भुजाएँ और दस पैर हैं। वे काजलके समान काले रंगकी हैं तथा तीस नेत्रोंकी विशाल पङ्क्ति से सुशोभित होती हैं
Verse 4 स्फुरद्दशनदंष्ट्रा सा भीमरूपापि भूमिप।

रूपसौभाग्यकान्तीनां सा प्रतिष्ठा महाश्रियः ॥4॥
भूपाल! उनके दाँत और दाढ़ें चमकती रहती हैं। यद्यपि उनका रूप भयंकर है, तथापि वे रूप, सौभाग्य, कान्ति एवं महती सम्पदाकी अधिष्ठान (प्राप्तिस्थान) हैं
Verse 5 खड्गबाणगदाशूलचक्रशङ्खभुशुण्डिभृत्।

परिघं कार्मुकं शीर्षं निश्च्योतद्रुधिरं दधौ ॥5॥
वे अपने हाथोंमें खड्ग, बाण, गदा, शूल, चक्र, शङ्ख, भुशुण्डि, परिघ, धनुष तथा जिससे रक्त चूता रहता है, ऐसा कटा हुआ मस्तक धारण करती हैं
Verse 6 एषा सा वैष्णवी माया महाकाली दुरत्यया।

आराधिता वशीकुर्यात् पूजाकर्तुश्चराचरम् ॥6॥
ये महाकाली भगवान् विष्णु की दुस्तर माया हैं। आराधना करनेपर ये चराचर जगत्को अपने उपासकके अधीन कर देती हैं
Verse 7 सर्वदेवशरीरेभ्यो याऽऽविर्भूतामितप्रभा।

त्रिगुणा सा महालक्ष्मीः साक्षान्महिषमर्दिनी ॥7॥
सम्पूर्ण देवताओंके अङ्गोंसे जिनका प्रादुर्भाव हुआ था, वे अनन्त कान्तिसे युक्त साक्षात् महालक्ष्मी हैं। उन्हें ही त्रिगुणमयी प्रकृति कहते हैं तथा वे ही महिषासुरका मर्दन करनेवाली हैं
Verse 8 श्वेतानना नीलभुजा सुश्वेतस्तनमण्डला।

रक्तमध्या रक्तपादा नीलजङ्घोरुरुन्मदा ॥8॥
उनका मुख गोरा, भुजाएँ श्याम, स्तनमण्डल अत्यन्त श्वेत, कटिभाग और चरण लाल तथा जङ्घा और पिंडली नीले रंगकी हैं। अजेय होनेके कारण उनको अपने शौर्यका अभिमान है

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