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SHRI DURGA SAPTSHATI

दशम अध्याय

DASHAM ADHYAY (Page 2)

अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता।

तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥8॥

मैं अपनी ऐश्वर्यशक्तिसे अनेक रूपोंमें यहाँ उपस्थित हुई थी। उन सब रूपोंको मैंने समेट लिया। अब अकेली ही युद्धमें खड़ी हूँ। तुम भी स्थिर हो जाओ ॥8॥
ऋषिरुवाच ॥9॥

ऋषि कहते हैं - ॥9॥
ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः।

पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥10॥

॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
शुम्भवधो नाम दशमोऽध्यायः ॥10॥

तदनन्तर देवी और शुम्भ दोनों में सब देवताओं तथा दानवोंके देखते-देखते भयंकर युद्ध छिड़ गया ॥10॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत
देवी माहात्म्य में 'शुम्भ-वध' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥10॥
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथास्त्रैश्चैव दारुणैः।

तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥11॥

बाणोंकी वर्षा तथा तीखे शस्त्रों एवं दारुण अस्त्रोंके प्रहारके कारण उन दोनोंका युद्ध सब लोगोंके लिये बड़ा भयानक प्रतीत हुआ ॥11॥
दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका।

बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥12॥

उस समय अम्बिका देवीने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज शुम्भने उनके निवारक अस्त्रोंद्वारा काट डाला ॥12॥
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी।

बभञ्ज लीलयैवोग्रहु*ङ्कारोच्चारणादिभिः ॥13॥

इसी प्रकार शुम्भने भी जो दिव्य अस्त्र चलाये; उन्हें परमेश्वरीने भयंकर हुंकार शब्दके उच्चारण आदिद्वारा खिलवाड़में ही नष्ट कर डाला ॥13॥
ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः।

सापि* तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ॥14॥

तब उस असुरने सैकड़ों बाणोंसे देवीको आच्छादित कर दिया। यह देख क्रोधमें भरी हुई उन देवीने भी बाण मारकर उसका धनुष काट डाला ॥14॥
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे।

चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥15॥

धनुष कट जानेपर फिर दैत्यराजने शक्ति हाथमें ली, किंतु देवीने चक्रसे उसके हाथकी शक्तिको भी काट गिराया ॥15॥

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