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SHRI DURGA SAPTSHATI

दशम अध्याय

DASHAM ADHYAY (Page 4)

ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह।

उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥24॥

फिर अम्बिकाने शुम्भके साथ बहुत देरतक युद्ध करनेके पश्चात् उसे उठाकर घुमाया और पृथ्वीपर पटक दिया ॥24॥
स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः*।

अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥25॥

पटके जानेपर पृथ्वीपर आनेके बाद वह दुष्टात्मा दैत्य पुनः चण्डिकाका वध करनेके लिये उनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥25॥
तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम्।

जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥26॥

तब समस्त दैत्योंके राजा शुम्भको अपनी ओर आते देख देवीने त्रिशूलसे उसकी छाती छेदकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥26॥
स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः।

चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ॥27॥

देवीके शूलकी धारसे घायल होनेपर उसके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीको कँपाता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥27॥
ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि।

जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥28॥

तदनन्तर उस दुरात्माके मारे जानेपर सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया तथा आकाश स्वच्छ दिखायी देने लगा ॥28॥
उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः।

सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥29॥

पहले जो उत्पातसूचक मेघ और उल्कापात होते थे, वे सब शान्त हो गये तथा उस दैत्यके मारे जानेपर नदियाँ भी ठीक मार्गसे बहने लगीं ॥29॥
ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः।

बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥30॥

उस समय शुम्भकी मृत्युके बाद सम्पूर्ण देवताओंका हृदय हर्षसे भर गया और गन्धर्वगण मधुर गीत गाने लगे ॥30॥
अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः।

ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ॥31॥

दूसरे गन्धर्व बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। पवित्र वायु बहने लगी। सूर्यकी प्रभा उत्तम हो गयी ॥31॥

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