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SHRI DURGA SAPTSHATI

दशम अध्याय

DASHAM ADHYAY (Page 3)

ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत्।

अभ्यधावत्तदा* देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ॥16॥

तत्पश्चात् दैत्योंके स्वामी शुम्भने सौ चाँदवाली चमकती हुई ढाल और तलवार हाथमें ले उस समय देवीपर धावा किया ॥16॥
तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका।

धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम्* ॥17॥

उसके आते ही चण्डिकाने अपने धनुषसे छोड़े हुए तीखे बाणोंद्वारा उसकी सूर्यकिरणोंके समान उज्ज्वल ढाल और तलवारको तुरंत काट दिया ॥17॥
हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः।

जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः ॥18॥

फिर उस दैत्यके घोड़े और सारथि मारे गये, धनुष तो पहले ही कट चुका था, अब उसने अम्बिका को मारनेके लिये उद्यत हो भयंकर मुद्गर हाथमें लिया ॥18॥
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः।

तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥19॥

उसे आते देख देवीने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसका मुद्गर भी काट डाला, तिसपर भी वह असुर मुक्का तानकर बड़े वेगसे देवीकी ओर झपटा ॥19॥
स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः।

देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥20॥

उस दैत्यराजने देवीकी छातीमें मुक्का मारा, तब उन देवीने भी उसकी छातीमें एक चाँटा जड़ दिया ॥20॥
तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले।

स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥21॥

देवीका थप्पड़ खाकर दैत्यराज शुम्भ पृथ्वीपर गिर पड़ा, किंतु पुनः सहसा पूर्ववत् उठकर खड़ा हो गया ॥21॥
उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः।

तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥22॥

फिर वह उछला और देवीको ऊपर ले जाकर आकाशमें खड़ा हो गया; तब चण्डिका आकाशमें भी बिना किसी आधारके ही शुम्भके साथ युद्ध करने लगीं ॥22॥
नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम्।

चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥23॥

उस समय दैत्य और चण्डिका आकाशमें एक-दूसरे से लड़ने लगे। उनका वह युद्ध पहले सिद्ध और मुनियोंको विस्मयमें डालनेवाला हुआ ॥23॥

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