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SHRI DURGA SAPTSHATI

एकादश अध्याय

EKADASH ADHYAY (Page 2)

सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते।

स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥8॥

बुद्धिरूपसे सब लोगोंके हृदयमें विराजमान रहनेवाली तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली नारायणी देवि! तुम्हें नमस्कार है ॥8॥
कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि।

विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥9॥

कला, काष्ठा आदिके रूपसे क्रमशः परिणाम- (अवस्था परिवर्तन) की ओर ले जानेवाली तथा विश्वका उपसंहार करनेमें समर्थ नारायणि! तुम्हें नमस्कार है ॥9॥
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये* शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥10॥

नारायणि! तुम सब प्रकारका मङ्गल प्रदान करनेवाली मङ्गलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है ॥10॥
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।

गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥11॥

॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
देव्याः स्तुतिर्नामैकादशोऽध्यायः ॥11॥

तुम सृष्टि, पालन और संहारकी शक्तिभूता, सनातनी देवी, गुणोंका आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि! तुम्हें नमस्कार है ॥11॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत
देवी माहात्म्य में 'देवीस्तुति' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥11॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥12॥

शरणमें आये हुए दीनों एवं पीड़ितोंकी रक्षामें संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी! तुम्हें नमस्कार है ॥12॥
हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि।

कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥13॥

नारायणि! तुम ब्रह्माणी का रूप धारण करके हंसोंसे जुते हुए विमानपर बैठती तथा कुश-मिश्रित जल छिड़कती रहती हो। तुम्हें नमस्कार है ॥13॥
त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि।

माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते ॥14॥

माहेश्वरी रूपसे त्रिशूल, चन्द्रमा एवं सर्पको धारण करनेवाली तथा महान् वृषभकी पीठपर बैठनेवाली नारायणी देवी! तुम्हें नमस्कार है ॥14॥
मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे।

कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥15॥

मोरों और मुर्गेसे घिरी रहनेवाली तथा महाशक्ति धारण करनेवाली कौमारी रूपधारिणी निष्पापे नारायणि! तुम्हें नमस्कार है ॥15॥

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