Verse 9
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना ॥9॥
ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना ॥9॥
चामुण्डा देवी प्रेत पर आरुढ़ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती है। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं
Verse 10
माहेश्वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥10॥
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥10॥
माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती है। कौमारी का वाहन मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं
Verse 11
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता ॥11॥
ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता ॥11॥
वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मीदेवी हँस पर बैठी हुई हैं, और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं
Verse 12
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥12॥
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥12॥
इस प्रकार ये सभी मातायें सब प्रकार की योग शक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं
Verse 13
दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥13॥
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥13॥
ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुयी हैं, और भक्तों की रक्षा के लिये रथ पर बैठी दिखायी देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति, हल,और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है
Verse 14
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥14॥
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥14॥
ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुयी हैं, और भक्तों की रक्षा के लिये रथ पर बैठी दिखायी देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति, हल,और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है
Verse 15
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥15॥
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥15॥
ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुयी हैं, और भक्तों की रक्षा के लिये रथ पर बैठी दिखायी देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति, हल,और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है
Verse 16
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥16॥
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥16॥
[कवच आरम्भ करने के पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-] महान् रौद्र रूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साह वाली देवि! तुम महान् भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है