Verse 1
॥ अथ श्री देव्याः कवचम् ॥
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्यब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरोबीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेनजपे विनियोगः।
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोकेसर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातंतन्मे ब्रूहि पितामह ॥1॥
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्यब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरोबीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेनजपे विनियोगः।
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोकेसर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातंतन्मे ब्रूहि पितामह ॥1॥
अथ देवी-कवच
ॐ इस श्रीचण्डीकवचके ब्रह्मा ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, चामुण्डा देवता, अड्ङ्गन्यासमें कही गयी माताएँ बीज, दिग्बन्ध देवता तत्त्व हैं, श्रीजगदम्बाकी प्रीतिके लिये सप्तशतीके पाठाङ्गभूत जपमें इसका विनियोग किया जाता है।
ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।
मार्कण्डेय जी ने कहा - पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है, और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये
ॐ इस श्रीचण्डीकवचके ब्रह्मा ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, चामुण्डा देवता, अड्ङ्गन्यासमें कही गयी माताएँ बीज, दिग्बन्ध देवता तत्त्व हैं, श्रीजगदम्बाकी प्रीतिके लिये सप्तशतीके पाठाङ्गभूत जपमें इसका विनियोग किया जाता है।
ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।
मार्कण्डेय जी ने कहा - पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है, और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये
Verse 2
ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥2॥
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥2॥
ब्रह्माजी बोले - ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है। महामुने! उसे श्रवण करो
Verse 3
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥3॥
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥3॥
देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें 'नवदुर्गा' कहते हैं। उनके पृथक्-पृथक् नाम बतलाये जाते हैं। प्रथम नाम 'शैलपुत्री' है। दूसरी मूर्ति का नाम 'ब्रह्मचारिणी' है। तीसरा स्वरूप 'चन्द्रघण्टा' के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को 'कूष्माण्डा' कहते हैं। पाँचवीं दुर्गा का नाम 'स्कन्दमाता' है। देवी के छठे रूप को 'कात्यायनी' कहते है। सातवाँ 'कालरात्रि' और आठवाँ स्वरूप 'महागौरी' के नाम से प्रसिद्ध है नवीं दुर्गा का नाम 'सिद्धिदात्री' है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं
Verse 4
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥4॥
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥4॥
देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें 'नवदुर्गा' कहते हैं। उनके पृथक्-पृथक् नाम बतलाये जाते हैं। प्रथम नाम 'शैलपुत्री' है। दूसरी मूर्ति का नाम 'ब्रह्मचारिणी' है। तीसरा स्वरूप 'चन्द्रघण्टा' के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को 'कूष्माण्डा' कहते हैं। पाँचवीं दुर्गा का नाम 'स्कन्दमाता' है। देवी के छठे रूप को 'कात्यायनी' कहते है। सातवाँ 'कालरात्रि' और आठवाँ स्वरूप 'महागौरी' के नाम से प्रसिद्ध है नवीं दुर्गा का नाम 'सिद्धिदात्री' है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं
Verse 5
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥5॥
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥5॥
देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें 'नवदुर्गा' कहते हैं। उनके पृथक्-पृथक् नाम बतलाये जाते हैं। प्रथम नाम 'शैलपुत्री' है। दूसरी मूर्ति का नाम 'ब्रह्मचारिणी' है। तीसरा स्वरूप 'चन्द्रघण्टा' के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को 'कूष्माण्डा' कहते हैं। पाँचवीं दुर्गा का नाम 'स्कन्दमाता' है। देवी के छठे रूप को 'कात्यायनी' कहते है। सातवाँ 'कालरात्रि' और आठवाँ स्वरूप 'महागौरी' के नाम से प्रसिद्ध है नवीं दुर्गा का नाम 'सिद्धिदात्री' है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं
Verse 6
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥6॥
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥6॥
जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो, तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमङ्गल नहीं होता युद्ध के समय संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती। उन्हें शोक, दुःख और भय की प्राप्ति नहीं होती
Verse 7
न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥7॥
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥7॥
जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो, तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमङ्गल नहीं होता युद्ध के समय संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती। उन्हें शोक, दुःख और भय की प्राप्ति नहीं होती
Verse 8
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ॥8॥
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ॥8॥
जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम निःसन्देह रक्षा करती हो