ADVERTISEMENT
Invest Smart Ad

Right Ad Space

SHRI DURGA SAPTSHATI

मूर्तिरहस्यम्

MURTIRAHASYAM (Page 2)

Verse 9 खड्गं पात्रं च मुसलं लाङ्गलं च बिभर्ति सा।

आख्याता रक्तचामुण्डा देवी योगेश्वरीति च ॥9॥
वे अपनी चार भुजाओंमें खड्ग, पानपात्र, मुसल और हल धारण करती हैं। ये ही रक्तचामुण्डा और योगेश्वरीदेवी कहलाती हैं
Verse 10 अनया व्याप्तमखिलं जगत्स्थावरजङ्गमम्।

इमां यः पूजयेद्भक्त्या स व्याप्नोति चराचरम् ॥10॥
इनके द्वारा सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है। जो इन रक्तदन्तिका देवीका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह भी चराचर जगत् में व्याप्त होता है
Verse 11 (भुक्त्वा भोगान् यथाकामं देवीसायुज्यमाप्नुयात्।)

अधीते य इमं नित्यं रक्तदन्त्या वपुःस्तवम्।

तं सा परिचरेद्देवी पतिं प्रियमिवाङ्गना ॥11॥
(वह यथेष्ट भोगोंको भोगकर अन्तमें देवीके साथ सायुज्य प्राप्त कर लेता है।) जो प्रतिदिन रक्तदन्तिका देवीके शरीरका यह स्तवन करता है, उसकी वे देवी प्रेमपूर्वक संरक्षणरूप सेवा करती हैं - ठीक उसी तरह, जैसे पतिव्रता नारी अपने प्रियतम पतिकी परिचर्या करती है
Verse 12 शाकम्भरी नीलवर्णा नीलोत्पलविलोचना।

गम्भीरनाभिस्त्रिवलीविभूषिततनूदरी ॥12॥
शाकम्भरी देवी के शरीरकी कान्ति नीले रंगकी है। उनके नेत्र नीलकमलके समान हैं, नाभि नीची है तथा त्रिवलीसे विभूषित उदर (मध्यभाग) सूक्ष्म है
Verse 13 सुकर्कशसमोत्तुङ्गवृत्तपीनघनस्तनी।

मुष्टिं शिलीमुखापूर्णं कमलं कमलालया ॥13॥
उनके दोनों स्तन अत्यन्त कठोर, सब ओरसे बराबर, ऊँचे, गोल, स्थूल तथा परस्पर सटे हुए हैं। वे परमेश्वरी कमलमें निवास करनेवाली हैं और हाथोंमें बाणोंसे भरी मुष्टि, कमल, शाक-समूह तथा प्रकाशमान धनुष धारण करती हैं। वह शाकसमूह अनन्त मनोवाञ्छित रसोंसे युक्त तथा क्षुधा, तृषा और मृत्युके भयको नष्ट करनेवाला तथा फूल, पल्लव, मूल आदि एवं फलोंसे सम्पन्न है। वे ही शाकम्भरी, शताक्षी तथा दुर्गा कही गयी हैं
Verse 14 पुष्पपल्लवमूलादिफलाढ्यं शाकसञ्चयम्।

काम्यानन्तरसैर्युक्तं क्षुत्तृण्मृत्युभयापहम् ॥14॥
उनके दोनों स्तन अत्यन्त कठोर, सब ओरसे बराबर, ऊँचे, गोल, स्थूल तथा परस्पर सटे हुए हैं। वे परमेश्वरी कमलमें निवास करनेवाली हैं और हाथोंमें बाणोंसे भरी मुष्टि, कमल, शाक-समूह तथा प्रकाशमान धनुष धारण करती हैं। वह शाकसमूह अनन्त मनोवाञ्छित रसोंसे युक्त तथा क्षुधा, तृषा और मृत्युके भयको नष्ट करनेवाला तथा फूल, पल्लव, मूल आदि एवं फलोंसे सम्पन्न है। वे ही शाकम्भरी, शताक्षी तथा दुर्गा कही गयी हैं
Verse 15 कार्मुकं च स्फुरत्कान्ति बिभ्रती परमेश्वरी।

शाकम्भरी शताक्षी सा सैव दुर्गा प्रकीर्तिता ॥15॥
उनके दोनों स्तन अत्यन्त कठोर, सब ओरसे बराबर, ऊँचे, गोल, स्थूल तथा परस्पर सटे हुए हैं। वे परमेश्वरी कमलमें निवास करनेवाली हैं और हाथोंमें बाणोंसे भरी मुष्टि, कमल, शाक-समूह तथा प्रकाशमान धनुष धारण करती हैं। वह शाकसमूह अनन्त मनोवाञ्छित रसोंसे युक्त तथा क्षुधा, तृषा और मृत्युके भयको नष्ट करनेवाला तथा फूल, पल्लव, मूल आदि एवं फलोंसे सम्पन्न है। वे ही शाकम्भरी, शताक्षी तथा दुर्गा कही गयी हैं
Verse 16 विशोका दुष्टदमनी शमनी दुरितापदाम्।

उमा गौरी सती चण्डी कालिका सा च पार्वती ॥16॥
वे शोकसे रहित, दुष्टोंका दमन करनेवाली तथा पाप और विपत्तिको शान्त करनेवाली हैं। उमा, गौरी, सती, चण्डी, कालिका और पार्वती भी वे ही हैं

© 2026 Durga Saptshati Pallabhav Technosoft. All Rights Reserved.