Verse 17
शाकम्भरीं स्तुवन् ध्यायञ्जपन् सम्पूजयन्नमन्।
अक्षय्यमश्नुते शीघ्रमन्नपानामृतं फलम् ॥17॥
अक्षय्यमश्नुते शीघ्रमन्नपानामृतं फलम् ॥17॥
जो मनुष्य शाकम्भरी देवीकी स्तुति, ध्यान, जप, पूजा और वन्दन करता है, वह शीघ्र ही अन्न, पान एवं अमृतरूप अक्षय फलका भागी होता है
Verse 18
भीमापि नीलवर्णा सा दंष्ट्रादशनभासुरा।
विशाललोचना नारी वृत्तपीनपयोधरा ॥18॥
विशाललोचना नारी वृत्तपीनपयोधरा ॥18॥
भीमा देवी का वर्ण भी नील ही है। उनकी दाढ़ें और दाँत चमकते रहते हैं। उनके नेत्र बड़े-बड़े हैं, स्वरूप स्त्रीका है, स्तन गोल-गोल और स्थूल हैं। वे अपने हाथोंमें चन्द्रहास नामक खड्ग, डमरू, मस्तक और पानपात्र धारण करती हैं। वे ही एकवीरा, कालरात्रि तथा कामदा कहलाती और इन नामोंसे प्रशंसित होती हैं
Verse 19
चन्द्रहासं च डमरुं शिरः पात्रं च बिभ्रती।
एकवीरा कालरात्रिः सैवोक्ता कामदा स्तुता ॥19॥
एकवीरा कालरात्रिः सैवोक्ता कामदा स्तुता ॥19॥
भीमा देवी का वर्ण भी नील ही है। उनकी दाढ़ें और दाँत चमकते रहते हैं। उनके नेत्र बड़े-बड़े हैं, स्वरूप स्त्रीका है, स्तन गोल-गोल और स्थूल हैं। वे अपने हाथोंमें चन्द्रहास नामक खड्ग, डमरू, मस्तक और पानपात्र धारण करती हैं। वे ही एकवीरा, कालरात्रि तथा कामदा कहलाती और इन नामोंसे प्रशंसित होती हैं
Verse 20
तेजोमण्डलदुर्धर्षा भ्रामरी चित्रकान्तिभृत्।
चित्रानुलेपना देवी चित्राभरणभूषिता ॥20॥
चित्रानुलेपना देवी चित्राभरणभूषिता ॥20॥
भ्रामरी देवी की कान्ति विचित्र (अनेक रंगकी) है। वे अपने तेजोमण्डलके कारण दुर्धर्ष दिखायी देती हैं। उनका अङ्गराग भी अनेक रंगका है तथा वे चित्र-विचित्र आभूषणोंसे विभूषित हैं
Verse 21
चित्रभ्रमरपाणिः सा महामारीति गीयते।
इत्येता मूर्तयो देव्या याः ख्याता वसुधाधिप ॥21॥
इत्येता मूर्तयो देव्या याः ख्याता वसुधाधिप ॥21॥
चित्रभ्रमरपाणि और महामारी आदि नामोंसे उनकी महिमाका गान किया जाता है। राजन्! इस प्रकार जगन्माता चण्डिका देवीकी ये मूर्तियाँ बतलायी गयी हैं
Verse 22
जगन्मातुश्चण्डिकायाः कीर्तिताः कामधेनवः।
इदं रहस्यं परमं न वाच्यं कस्यचित्त्वया ॥22॥
इदं रहस्यं परमं न वाच्यं कस्यचित्त्वया ॥22॥
जो कीर्तन करनेपर कामधेनुके समान सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करती हैं। यह परम गोपनीय रहस्य है। इसे तुम्हें दूसरे किसीको नहीं बतलाना चाहिये
Verse 23
व्याख्यानं दिव्यमूर्तीनामभीष्टफलदायकम्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन देवीं जप निरन्तरम् ॥23॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन देवीं जप निरन्तरम् ॥23॥
दिव्य मूर्तियोंका यह आख्यान मनोवाञ्छित फल देनेवाला है, इसलिये पूर्ण प्रयत्न करके तुम निरन्तर देवीके जप- (आराधन-) में लगे रहो
Verse 24
सप्तजन्मार्जितैर्घोरैर्ब्रह्महत्यासमैरपि।
पाठमात्रेण मन्त्राणां मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥24॥
पाठमात्रेण मन्त्राणां मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥24॥
सप्तशतीके मन्त्रोंके पाठमात्रसे मनुष्य सात जन्मोंमें उपार्जित ब्रह्महत्यासदृश घोर पातकों एवं समस्त कल्मषोंसे मुक्त हो जाता है