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SHRI DURGA SAPTSHATI

मूर्तिरहस्यम्

MURTIRAHASYAM (Page 4)

Verse 25 देव्या ध्यानं मया ख्यातं गुह्याद् गुह्यतरं महत्।

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सर्वकामफलप्रदम् ॥25॥
इसलिये मैंने पूर्ण प्रयत्न करके देवीके गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय ध्यानका वर्णन किया है, जो सब प्रकारके मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है
॥ इति मूर्तिरहस्यं सम्पूर्णम् ॥

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