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SHRI DURGA SAPTSHATI

प्राधानिकं रहस्यम्

PRADHANIKAM RAHASYAM (Page 2)

Verse 8 सा भिन्नाञ्जनसङ्काशा दंष्ट्राङ्कितवरानना।

विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा ॥8॥
वह रूप एक नारीके रूपमें प्रकट हुआ, जिसके शरीरकी कान्ति निखरे हुए काजलकी भाँति काले रंगकी थी, उसका श्रेष्ठ मुख दाढ़ोंसे सुशोभित था। नेत्र बड़े-बड़े और कमर पतली थी
Verse 9 खड्गपात्रशिरःखेटैरलङ्कृतचतुर्भुजा।

कबन्धहारं शिरसा बिभ्राणा हि शिरःस्रजम् ॥9॥
उसकी चार भुजाएँ ढाल, तलवार, प्याले और कटे हुए मस्तकसे सुशोभित थीं। वह वक्षःस्थलपर कबन्ध- (धड़-) की तथा मस्तकपर मुण्डोंकी माला धारण किये हुए थी
Verse 10 सा प्रोवाच महालक्ष्मीं तामसी प्रमदोत्तमा।

नाम कर्म च मे मातर्देहि तुभ्यं नमो नमः ॥10॥
इस प्रकार प्रकट हुई स्त्रियोंमें श्रेष्ठ तामसीदेवीने महालक्ष्मीसे कहा- 'माताजी! आपको नमस्कार है। मुझे मेरा नाम और कर्म बताइये '
Verse 11 तां प्रोवाच महालक्ष्मीस्तामसीं प्रमदोत्तमाम्।

ददामि तव नामानि यानि कर्माणि तानि ते ॥11॥
तब महालक्ष्मीने स्त्रियोंमें श्रेष्ठ उस तामसीदेवीसे कहा- 'मैं तुम्हें नाम प्रदान करती हूँ और तुम्हारे जो-जो कर्म हैं, उनको भी बतलाती हूँ,
Verse 12 महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा।

निद्रा तृष्णा चैकवीरा कालरात्रिर्दुरत्यया ॥12॥
महामाया, महाकाली, महामारी, क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि तथा दुरत्यया -
Verse 13 इमानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि कर्मभिः।

एभिः कर्माणि ते ज्ञात्वा योऽधीते सोऽश्नुते सुखम् ॥13॥
ये तुम्हारे नाम हैं, जो कर्मोंके द्वारा लोकमें चरितार्थ होंगे। इन नामोंके द्वारा तुम्हारे कर्मोंको जानकर जो उनका पाठ करता है, वह सुख भोगता है '
Verse 14 तामित्युक्त्वा महालक्ष्मीः स्वरूपमपरं नृप।

सत्त्वाख्येनातिशुद्धेन गुणेनेन्दुप्रभं दधौ ॥14॥
राजन्! महाकालीसे यों कहकर महालक्ष्मीने अत्यन्त शुद्ध सत्त्वगुणके द्वारा दूसरा रूप धारण किया, जो चन्द्रमाके समान गौरवर्ण था
Verse 15 अक्षमालाङ्कुशधरा वीणापुस्तकधारिणी।

सा बभूव वरा नारी नामान्यस्यै च सा ददौ ॥15॥
वह श्रेष्ठ नारी अपने हाथोंमें अक्षमाला, अङ्कुश, वीणा तथा पुस्तक धारण किये हुए थी। महालक्ष्मीने उसे भी नाम प्रदान किये

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