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SHRI DURGA SAPTSHATI

प्राधानिकं रहस्यम्

PRADHANIKAM RAHASYAM (Page 4)

Verse 24 विष्णुः कृष्णो हृषीकेशो वासुदेवो जनार्दनः।

उमा गौरी सती चण्डी सुन्दरी सुभगा शिवा ॥24॥
उनमें पुरुषके नाम विष्णु, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव और जनार्दन हुए तथा स्त्री उमा, गौरी, सती, चण्डी, सुन्दरी, सुभगा और शिवा - इन नामोंसे प्रसिद्ध हुई
Verse 25 एवं युवतयः सद्यः पुरुषत्वं प्रपेदिरे।

चक्षुष्मन्तो नु पश्यन्ति नेतरेऽतद्विदो जनाः ॥25॥
इस प्रकार तीनों युवतियाँ ही तत्काल पुरुषरूपको प्राप्त हुईं। इस बातको ज्ञाननेत्रवाले लोग ही समझ सकते हैं। दूसरे अज्ञानीजन इस रहस्यको नहीं जान सकते
Verse 26 ब्रह्मणे प्रददौ पत्नीं महालक्ष्मीर्नृप त्रयीम्।

रुद्राय गौरीं वरदां वासुदेवाय च श्रियम् ॥26॥
राजन्! महालक्ष्मीने त्रयीविद्यारूपा सरस्वतीको ब्रह्माके लिये पत्नीरूपमें समर्पित किया, रुद्रको वरदायिनी गौरी तथा भगवान् वासुदेवको लक्ष्मी दे दी
Verse 27 स्वरया सह सम्भूय विरिञ्चोऽण्डमजीजनत्।

बिभेद भगवान् रुद्रस्तद् गौर्या सह वीर्यवान् ॥27॥
इस प्रकार सरस्वतीके साथ संयुक्त होकर ब्रह्माजीने ब्रह्माण्डको उत्पन्न किया और परम पराक्रमी भगवान् रुद्रने गौरीके साथ मिलकर उसका भेदन किया
Verse 28 अण्डमध्ये प्रधानादि कार्यजातमभून्नृप।

महाभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥28॥
राजन्! उस ब्रह्माण्डमें प्रधान (महत्तत्त्व) आदि कार्यसमूह - पञ्चमहाभूतात्मक समस्त स्थावर - जङ्गमरूप जगत् की उत्पत्ति हुई
Verse 29 पुपोष पालयामास तल्लक्ष्म्या सह केशवः।

सञ्जहार जगत्सर्वं सह गौर्या महेश्वरः ॥29॥
फिर लक्ष्मीके साथ भगवान् विष्णुने उस जगत्का पालन-पोषण किया और प्रलयकालमें गौरीके साथ महेश्वरने उस सम्पूर्ण जगत्का संहार किया
Verse 30 महालक्ष्मीर्महाराज सर्वसत्त्वमयीश्वरी।

निराकारा च साकारा सैव नानाभिधानभृत् ॥30॥
महाराज! महालक्ष्मी ही सर्वसत्त्वमयी तथा सब सत्त्वोंकी अधीश्वरी हैं। वे ही निराकार और साकाररूपमें रहकर नाना प्रकारके नाम धारण करती हैं
Verse 31 नामान्तरैर्निरूप्यैषा नाम्ना नान्येन केनचित्॥ॐ ॥31॥
सगुणवाचक सत्य, ज्ञान, चित्, महामाया आदि नामान्तरोंसे इन महालक्ष्मीका निरूपण करना चाहिये। केवल एक नाम- (महालक्ष्मीमात्र-) से अथवा अन्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणसे उनका वर्णन नहीं हो सकता

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