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SHRI DURGA SAPTSHATI

सप्तम अध्याय

SAPTAM ADHYAY (Page 2)

अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा।

निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा ॥8॥

उनका मुख बहुत विशाल था, जीभ लपलपानेके कारण वे और भी डरावनी प्रतीत होती थीं। उनकी आँखें भीतरको धँसी हुई और कुछ लाल थीं, वे अपनी भयंकर गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजा रही थीं ॥8॥
सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान्।

सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्बलम् ॥9॥

बड़े-बड़े दैत्योंका वध करती हुई वे कालिकादेवी बड़े वेगसे दैत्योंकी उस सेनापर टूट पड़ीं और उन सबको भक्षण करने लगीं ॥9॥
पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान्।

समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान् ॥10॥

वे पार्श्वरक्षकों, अङ्कुशधारी महावतों, योद्धाओं और घण्टासहित कितने ही हाथियोंको एक ही हाथसे पकड़कर मुँहमें डाल लेती थीं ॥10॥
तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह।

निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्य*तिभैरवम् ॥11॥

इसी प्रकार घोड़े, रथ और सारथिके साथ रथी सैनिकोंको मुँहमें डालकर वे उन्हें बड़े भयानक रूपसे चबा डालती थीं ॥11॥
एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम्।

पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत् ॥12॥

किसीके बाल पकड़ लेतीं, किसीका गला दबा देतीं, किसीको पैरोंसे कुचल डालतीं और किसीको छातीके धक्केसे गिराकर मार डालती थीं ॥12॥
तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः।

मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि ॥13॥

वे असुरोंके छोड़े हुए बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र मुँहसे पकड़ लेतीं और रोषमें भरकर उनको दाँतोंसे पीस डालती थीं ॥13॥
बलिनां तद् बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम्।

ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तथा ॥14॥

कालीने बलवान् एवं दुरात्मा दैत्योंकी वह सारी सेना रौंद डाली, खा डाली और कितनोंको मार भगाया ॥14॥
असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः*।

जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा ॥15॥

कोई तलवारके घाट उतारे गये, कोई खट्वाङ्गसे पीटे गये और कितने ही असुर दाँतोंके अग्रभागसे कुचले जाकर मृत्युको प्राप्त हुए ॥15॥

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