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SHRI DURGA SAPTSHATI

सप्तम अध्याय

SAPTAM ADHYAY (Page 4)

मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू।

युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि ॥24॥

'देवि! मैंने चण्ड और मुण्ड नामक इन दो महापशुओंको तुम्हें भेंट किया है। अब युद्धयज्ञमें तुम शुम्भ और निशुम्भका स्वयं ही वध करना' ॥24॥
ऋषिरुवाच ॥25॥

ऋषि कहते हैं - ॥25॥
तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ।

उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः ॥26॥

वहाँ लाये हुए उन चण्ड-मुण्ड नामक महादैत्योंको देखकर कल्याणमयी चण्डीने कालीसे मधुर वाणीमें कहा - ॥26॥
यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता।

चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि॥ॐ ॥27॥

'देवि! तुम चण्ड और मुण्डको लेकर मेरे पास आयी हो, इसलिये संसारमें चामुण्डा के नामसे तुम्हारी ख्याति होगी' ॥27॥

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