ADVERTISEMENT
Invest Smart Ad

Right Ad Space

SHRI DURGA SAPTSHATI

सप्तम अध्याय

SAPTAM ADHYAY (Page 3)

क्षणेन तद् बलं सर्वमसुराणां निपातितम्।

दृष्ट्वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम् ॥16॥

इस प्रकार देवीने असुरोंकी उस सारी सेनाको क्षणभरमें मार गिराया। यह देख चण्ड उन अत्यन्त भयानक कालीदेवीकी ओर दौड़ा ॥16॥
शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः।

छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः ॥17॥

तथा महादैत्य मुण्डने भी अत्यन्त भयंकर बाणोंकी वर्षासे तथा हजारों बार चलाये हुए चक्रोंसे उन भयानक नेत्रोंवाली देवीको आच्छादित कर दिया ॥17॥
तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम्।

बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम् ॥18॥

वे अनेकों चक्र देवीके मुखमें समाते हुए ऐसे जान पड़े, मानो सूर्यके बहुतेरे मण्डल बादलोंके उदरमें प्रवेश कर रहे हों ॥18॥
ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी।

कालीकरालवक्त्रान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला ॥19॥

तब भयंकर गर्जना करनेवाली कालीने अत्यन्त रोषमें भरकर विकट अट्टहास किया। उस समय उनके विकराल वदनके भीतर कठिनतासे देखे जा सकनेवाले दाँतोंकी प्रभासे वे अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देती थीं ॥19॥
उत्थाय च महासिं हं देवी चण्डमधावत।

गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत्* ॥20॥

देवीने बहुत बड़ी तलवार हाथमें ले 'हं' का उच्चारण करके चण्डपर धावा किया और उसके केश पकड़कर उसी तलवारसे उसका मस्तक काट डाला ॥20॥
अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम्।

तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा ॥21॥

चण्डको मारा गया देखकर मुण्ड भी देवीकी ओर दौड़ा। तब देवीने रोषमें भरकर उसे भी तलवारसे घायल करके धरतीपर सुला दिया ॥21॥
हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम्।

मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम् ॥22॥

महापराक्रमी चण्ड और मुण्डको मारा गया देख मरनेसे बची हुई बाकी सेना भयसे व्याकुल हो चारों ओर भाग गयी ॥22॥
शिरश्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च।

प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम् ॥23॥

तदनन्तर कालीने चण्ड और मुण्डका मस्तक हाथमें ले चण्डिकाके पास जाकर प्रचण्ड अट्टहास करते हुए कहा - ॥23॥

© 2026 Durga Saptshati Pallabhav Technosoft. All Rights Reserved.