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SHRI DURGA SAPTSHATI

त्रयोदश अध्याय

TRAYODASH ADHYAY (Page 3)

मार्कण्डेय उवाच ॥16॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - ॥16॥
ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि।

अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात् ॥17॥

तब राजाने दूसरे जन्ममें नष्ट न होनेवाला राज्य माँगा तथा इस जन्ममें भी शत्रुओंकी सेनाको बलपूर्वक नष्ट करके पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लेनेका वरदान माँगा ॥17॥
सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः।

ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम् ॥18॥

वैश्यका चित्त संसारकी ओरसे खिन्न एवं विरक्त हो चुका था और वे बड़े बुद्धिमान् थे; अतः उस समय उन्होंने तो ममता और अहंतारूप आसक्तिका नाश करनेवाला ज्ञान माँगा ॥18॥
देव्युवाच ॥19॥

देवी बोलीं - ॥19॥
स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान् ॥20॥

राजन्! तुम थोड़े ही दिनोंमें शत्रुओंको मारकर अपना राज्य प्राप्त कर लोगे। अब वहाँ तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ॥20-21॥
हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति ॥21॥

राजन्! तुम थोड़े ही दिनोंमें शत्रुओंको मारकर अपना राज्य प्राप्त कर लोगे। अब वहाँ तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ॥20-21॥
मृतश्च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः ॥22॥

फिर मृत्युके पश्चात् तुम भगवान् विवस्वान् - (सूर्य) के अंशसे जन्म लेकर इस पृथ्वीपर सावर्णिक मनुके नामसे विख्यात होओगे ॥22-23॥
सावर्णिको नाम* मनुर्भवान् भुवि भविष्यति ॥23॥

फिर मृत्युके पश्चात् तुम भगवान् विवस्वान् - (सूर्य) के अंशसे जन्म लेकर इस पृथ्वीपर सावर्णिक मनुके नामसे विख्यात होओगे ॥22-23॥

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