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SHRI DURGA SAPTSHATI

त्रयोदश अध्याय

TRAYODASH ADHYAY (Page 4)

वैश्यवर्य त्वया यश्च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः ॥24॥

वैश्यवर्य! तुमने भी जिस वरको मुझसे प्राप्त करनेकी इच्छा की है, उसे देती हूँ। तुम्हें मोक्षके लिये ज्ञान प्राप्त होगा ॥24-25॥
तं प्रयच्छामि संसिद्ध्यै तव ज्ञानं भविष्यति ॥25॥

वैश्यवर्य! तुमने भी जिस वरको मुझसे प्राप्त करनेकी इच्छा की है, उसे देती हूँ। तुम्हें मोक्षके लिये ज्ञान प्राप्त होगा ॥24-25॥
मार्कण्डेय उवाच ॥26॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - ॥26॥
इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम् ॥27॥

इस प्रकार उन दोनोंको मनोवाञ्छित वरदान देकर तथा उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर देवी अम्बिका तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। इस तरह देवीसे वरदान पाकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ सूर्यसे जन्म ले सावर्णि नामक मनु होंगे ॥27-29॥
बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता।

एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ॥28॥

इस प्रकार उन दोनोंको मनोवाञ्छित वरदान देकर तथा उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर देवी अम्बिका तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। इस तरह देवीसे वरदान पाकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ सूर्यसे जन्म ले सावर्णि नामक मनु होंगे ॥27-29॥
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः ॥29॥

इस प्रकार उन दोनोंको मनोवाञ्छित वरदान देकर तथा उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर देवी अम्बिका तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। इस तरह देवीसे वरदान पाकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ सूर्यसे जन्म ले सावर्णि नामक मनु होंगे ॥27-29॥

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