ADVERTISEMENT
Invest Smart Ad

Right Ad Space

SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वादश अध्याय

DWADASH ADHYAY (Page 3)

शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने।

ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम ॥16॥

सर्वत्र शान्ति-कर्ममें, बुरे स्वप्न दिखायी देनेपर तथा ग्रहजनित भयंकर पीड़ा उपस्थित होनेपर मेरा माहात्म्य श्रवण करना चाहिये ॥16॥
उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः।

दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते ॥17॥

इससे सब विघ्न तथा भयंकर ग्रह पीड़ाएँ शान्त हो जाती हैं और मनुष्योंद्वारा देखा हुआ दुःस्वप्न शुभ स्वप्नमें परिवर्तित हो जाता है ॥17॥
बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम्।

सङ्घातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम् ॥18॥

बालग्रहोंसे आक्रान्त हुए बालकोंके लिये यह माहात्म्य शान्तिकारक है तथा मनुष्योंके संगठनमें फूट होनेपर यह अच्छी प्रकार मित्रता करानेवाला होता है ॥18॥
दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम्।

रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम् ॥19॥

यह माहात्म्य समस्त दुराचारियोंके बलका नाश करानेवाला है। इसके पाठमात्रसे राक्षसों, भूतों और पिशाचोंका नाश हो जाता है ॥19॥
सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम्।

पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः ॥20॥

मेरा यह सब माहात्म्य मेरे सामीप्यकी प्राप्ति करानेवाला है। पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, दीप, गन्ध आदि उत्तम सामग्रियोंद्वारा पूजन करनेसे, ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे, होम करनेसे, प्रतिदिन अभिषेक करनेसे, नाना प्रकारके अन्य भोगोंका अर्पण करनेसे तथा दान देने आदिसे एक वर्षतक जो मेरी आराधना की जाती है और उससे मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी प्रसन्नता मेरे इस उत्तम चरित्रका एक बार श्रवण करनेमात्र से हो जाती है। यह माहात्म्य श्रवण करनेपर पापोंको हर लेता और आरोग्य प्रदान करता है ॥20-22॥
विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम्।

अन्यैश्च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या ॥21॥

मेरा यह सब माहात्म्य मेरे सामीप्यकी प्राप्ति करानेवाला है। पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, दीप, गन्ध आदि उत्तम सामग्रियोंद्वारा पूजन करनेसे, ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे, होम करनेसे, प्रतिदिन अभिषेक करनेसे, नाना प्रकारके अन्य भोगोंका अर्पण करनेसे तथा दान देने आदिसे एक वर्षतक जो मेरी आराधना की जाती है और उससे मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी प्रसन्नता मेरे इस उत्तम चरित्रका एक बार श्रवण करनेमात्र से हो जाती है। यह माहात्म्य श्रवण करनेपर पापोंको हर लेता और आरोग्य प्रदान करता है ॥20-22॥
प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते।

श्रुतं हरति पापानि तथाऽऽरोग्यं प्रयच्छति ॥22॥

मेरा यह सब माहात्म्य मेरे सामीप्यकी प्राप्ति करानेवाला है। पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, दीप, गन्ध आदि उत्तम सामग्रियोंद्वारा पूजन करनेसे, ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे, होम करनेसे, प्रतिदिन अभिषेक करनेसे, नाना प्रकारके अन्य भोगोंका अर्पण करनेसे तथा दान देने आदिसे एक वर्षतक जो मेरी आराधना की जाती है और उससे मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी प्रसन्नता मेरे इस उत्तम चरित्रका एक बार श्रवण करनेमात्र से हो जाती है। यह माहात्म्य श्रवण करनेपर पापोंको हर लेता और आरोग्य प्रदान करता है ॥20-22॥
रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम।

युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम् ॥23॥

मेरे प्रादुर्भावका कीर्तन समस्त भूतोंसे रक्षा करता है तथा मेरा युद्धविषयक चरित्र दुष्ट दैत्योंका संहार करनेवाला है ॥23॥

© 2026 Durga Saptshati Pallabhav Technosoft. All Rights Reserved.