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SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वादश अध्याय

DWADASH ADHYAY (Page 5)

इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा ॥32॥

यों कहकर प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिका सब देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं। फिर समस्त देवता भी शत्रुओंके मारे जानेसे निर्भय हो पहले की ही भाँति यज्ञभागका उपभोग करते हुए अपने-अपने अधिकारका पालन करने लगे। संसारका विध्वंस करनेवाले महाभयंकर अतुलपराक्रमी देवशत्रु शुम्भ तथा महाबली निशुम्भके युद्धमें देवीद्वारा मारे जानेपर शेष दैत्य पाताललोकमें चले आये ॥32-35॥
पश्यतामेव* देवानां तत्रैवान्तरधीयत।

तेऽपि देवा निरातङ्काः स्वाधिकारान् यथा पुरा ॥33॥

यों कहकर प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिका सब देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं। फिर समस्त देवता भी शत्रुओंके मारे जानेसे निर्भय हो पहले की ही भाँति यज्ञभागका उपभोग करते हुए अपने-अपने अधिकारका पालन करने लगे। संसारका विध्वंस करनेवाले महाभयंकर अतुलपराक्रमी देवशत्रु शुम्भ तथा महाबली निशुम्भके युद्धमें देवीद्वारा मारे जानेपर शेष दैत्य पाताललोकमें चले आये ॥32-35॥
यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः।

दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि ॥34॥

यों कहकर प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिका सब देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं। फिर समस्त देवता भी शत्रुओंके मारे जानेसे निर्भय हो पहले की ही भाँति यज्ञभागका उपभोग करते हुए अपने-अपने अधिकारका पालन करने लगे। संसारका विध्वंस करनेवाले महाभयंकर अतुलपराक्रमी देवशत्रु शुम्भ तथा महाबली निशुम्भके युद्धमें देवीद्वारा मारे जानेपर शेष दैत्य पाताललोकमें चले आये ॥32-35॥
जगद्विध्वंसिनि तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे।

निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः ॥35॥

यों कहकर प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिका सब देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं। फिर समस्त देवता भी शत्रुओंके मारे जानेसे निर्भय हो पहले की ही भाँति यज्ञभागका उपभोग करते हुए अपने-अपने अधिकारका पालन करने लगे। संसारका विध्वंस करनेवाले महाभयंकर अतुलपराक्रमी देवशत्रु शुम्भ तथा महाबली निशुम्भके युद्धमें देवीद्वारा मारे जानेपर शेष दैत्य पाताललोकमें चले आये ॥32-35॥
एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः।

सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम् ॥36॥

राजन्! इस प्रकार भगवती अम्बिकादेवी नित्य होती हुई भी पुनः पुनः प्रकट होकर जगत्की रक्षा करती हैं ॥36॥
तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते।

सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति ॥37॥

वे ही इस विश्वको मोहित करतीं, वे ही जगत्को जन्म देतीं तथा वे ही प्रार्थना करनेपर संतुष्ट हो विज्ञान एवं समृद्धि प्रदान करती हैं ॥37॥
व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर।

महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया ॥38॥

राजन्! महाप्रलयके समय महामारीका स्वरूप धारण करनेवाली वे महाकाली ही इस समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं ॥38॥
सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा।

स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी ॥39॥

वे ही समय - समयपर महामारी होती और वे ही स्वयं अजन्मा होती हुई भी सृष्टिके रूपमें प्रकट होती हैं। वे सनातनी देवी ही समयानुसार सम्पूर्ण भूतोंकी रक्षा करती हैं ॥39॥

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