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SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वादश अध्याय

DWADASH ADHYAY (Page 4)

तस्मिञ्छ्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते।

युष्माभिः स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिःकृताः ॥24॥

इसके श्रवण करनेपर मनुष्योंको शत्रुका भय नहीं रहता। देवताओ! तुमने और ब्रह्मर्षियोंने जो मेरी स्तुतियाँ की हैं ॥24॥
ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां मतिम्।

अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः ॥25॥

तथा ब्रह्माजीने जो स्तुतियाँ की हैं, वे सभी कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। वनमें, सूने मार्गमें अथवा दावानलसे घिर जानेपर ॥25॥
दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः।

सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः ॥26॥

निर्जन स्थानमें लुटेरोंके दावमें पड़ जानेपर या शत्रुओंसे पकड़े जानेपर अथवा जंगलमें सिंह, व्याघ्र या जंगली हाथियोंके पीछा करनेपर ॥26॥
राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा।

आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे ॥27॥

कुपित राजाके आदेशसे वध या बन्धनके स्थानमें ले जाये जानेपर अथवा महासागरमें नावपर बैठनेके बाद भारी तूफानसे नावके डगमग होनेपर ॥27॥
पतत्सु चापि शस्त्रेषु सङ्ग्रामे भृशदारुणे।

सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा ॥28॥

और अत्यन्त भयंकर युद्धमें शस्त्रोंका प्रहार होनेपर अथवा वेदनासे पीड़ित होनेपर, किं बहुना, सभी भयानक बाधाओंके उपस्थित होनेपर ॥28॥
स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत सङ्कटात्।

मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा ॥29॥

जो मेरे इस चरित्रका स्मरण करता है, वह मनुष्य संकटसे मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभावसे सिंह आदि हिंसक जन्तु नष्ट हो जाते हैं तथा लुटेरे और शत्रु भी मेरे चरित्रका स्मरण करनेवाले पुरुषसे दूर भागते हैं ॥29-30॥
दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम ॥30॥

जो मेरे इस चरित्रका स्मरण करता है, वह मनुष्य संकटसे मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभावसे सिंह आदि हिंसक जन्तु नष्ट हो जाते हैं तथा लुटेरे और शत्रु भी मेरे चरित्रका स्मरण करनेवाले पुरुषसे दूर भागते हैं ॥29-30॥
ऋषिरुवाच ॥31॥

ऋषि कहते हैं - ॥31॥

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