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SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वादश अध्याय

DWADASH ADHYAY (Page 6)

भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे।

सैवाभावे तथाऽलक्ष्मीर्विनाशायोपजायते ॥40॥

मनुष्योंके अभ्युदयके समय वे ही घरमें लक्ष्मीके रूपमें स्थित हो उन्नति प्रदान करती हैं और वे ही अभावके समय दरिद्रता बनकर विनाशका कारण होती हैं ॥40॥
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिभिस्तथा।

ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं* शुभाम्॥ॐ ॥41॥

पुष्प, धूप और गन्ध आदिसे पूजन करके उनकी स्तुति करनेपर वे धन, पुत्र, धार्मिक बुद्धि तथा उत्तम गति प्रदान करतीहैं ॥41॥

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