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SHRI DURGA SAPTSHATI

नवम अध्याय

NAVAM ADHYAY (Page 2)

आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः।

निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः ॥8॥

महापराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेनाके साथ मातृगणोंसे युद्ध करके क्रोधवश चण्डिका को मारनेके लिये आ पहुँचा ॥8॥
ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः।

शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः ॥9॥

॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
निशुम्भवधो नाम नवमोऽध्यायः ॥9॥

तब देवीके साथ शुम्भ और निशुम्भका घोर संग्राम छिड़ गया। वे दोनों दैत्य मेघोंकी भाँति बाणोंकी भयंकर वृष्टि कर रहे थे ॥9॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत
देवी माहात्म्य में 'निशुम्भ-वध' नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥9॥
चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः*।

ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ ॥10॥

उन दोनोंके चलाये हुए बाणोंको चण्डिकाने अपने बाणोंके समूहसे तुरंत काट डाला और शस्त्रसमूहोंकी वर्षा करके उन दोनों दैत्यपतियोंके अङ्गोंमें भी चोट पहुँचायी ॥10॥
निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम्।

अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम् ॥11॥

निशुम्भने तीखी तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर देवीके श्रेष्ठ वाहन सिंहके मस्तकपर प्रहार किया ॥11॥
ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम्।

निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम् ॥12॥

अपने वाहनको चोट पहुँचनेपर देवीने क्षुरप्र नामक बाणसे निशुम्भकी श्रेष्ठ तलवार तुरंत ही काट डाली और उसकी ढालको भी, जिसमें आठ चाँद जड़े थे, खण्ड-खण्ड कर दिया ॥12॥
छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः।

तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम् ॥13॥

ढाल और तलवारके कट जानेपर उस असुरने शक्ति चलायी, किंतु सामने आनेपर देवीने चक्रसे उसके भी दो टुकड़े कर दिये ॥13॥
कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः।

आयातं* मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत् ॥14॥

अब तो निशुम्भ क्रोधसे जल उठा और उस दानवने देवीको मारनेके लिये शूल उठाया; किंतु देवीने समीप आनेपर उसे भी मुक्केसे मारकर चूर्ण कर दिया ॥14॥
आविध्याथ* गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति।

सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता ॥15॥

तब उसने गदा घुमाकर चण्डीके ऊपर चलायी, परंतु वह भी देवीके त्रिशूलसे कटकर भस्म हो गयी ॥15॥

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