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SHRI DURGA SAPTSHATI

नवम अध्याय

NAVAM ADHYAY (Page 3)

ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम्।

आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले ॥16॥

तदनन्तर दैत्यराज निशुम्भको फरसा हाथमें लेकर आते देख देवीने बाणसमूहोंसे घायलकर धरतीपर सुला दिया ॥16॥
तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे।

भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम् ॥17॥

उस भयंकर पराक्रमी भाई निशुम्भके धराशायी हो जानेपर शुम्भको बड़ा क्रोध हुआ और अम्बिकाका वध करनेके लिये वह आगे बढ़ा ॥17॥
स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः।

भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं बभौ नभः ॥18॥

रथपर बैठे-बैठे ही उत्तम आयुधों से सुशोभित अपनी बड़ी-बड़ी आठ अनुपम भुजाओंसे समूचे आकाशको ढककर वह अद्भुत शोभा पाने लगा ॥18॥
तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत्।

ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम् ॥19॥

उसे आते देख देवीने शङ्ख बजाया और धनुषकी प्रत्यञ्चाका भी अत्यन्त दुस्सह शब्द किया ॥19॥
पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च।

समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना ॥20॥

साथ ही अपने घण्टेके शब्दसे, जो समस्त दैत्य- सैनिकोंका तेज नष्ट करनेवाला था, सम्पूर्ण दिशाओंको व्याप्त कर दिया ॥20॥
ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः।

पूरयामास गगनं गां तथैव* दिशो दश ॥21॥

तदनन्तर सिंहने भी अपनी दहाड़से, जिसे सुनकर बड़े-बड़े गजराजोंका महान् मद दूर हो जाता था, आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाओंको गुँजा दिया ॥21॥
ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत्।

कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः ॥22॥

फिर कालीने आकाशमें उछलकर अपने दोनों हाथोंसे पृथ्वीपर आघात किया। उससे ऐसा भयंकर शब्द हुआ, जिससे पहलेके सभी शब्द शान्त हो गये ॥22॥
अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह।

तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ ॥23॥

तत्पश्चात् शिवदूतीने दैत्योंके लिये अमङ्गलजनक अट्टहास किया, इन शब्दोंको सुनकर समस्त असुर थर्रा उठे; किंतु शुम्भको बड़ा क्रोध हुआ ॥23॥

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