ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम्।
अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः ॥32॥
यह देख निशुम्भ दैत्यसेनाके साथ चण्डिकाका वध करनेके लिये हाथमें गदा ले बड़े वेगसे दौड़ा ॥32॥
अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः ॥32॥
यह देख निशुम्भ दैत्यसेनाके साथ चण्डिकाका वध करनेके लिये हाथमें गदा ले बड़े वेगसे दौड़ा ॥32॥
तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका।
खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे ॥33॥
उसके आते ही चण्डीने तीखी धारवाली तलवारसे उसकी गदाको शीघ्र ही काट डाला। तब उसने शूल हाथमें ले लिया ॥33॥
खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे ॥33॥
उसके आते ही चण्डीने तीखी धारवाली तलवारसे उसकी गदाको शीघ्र ही काट डाला। तब उसने शूल हाथमें ले लिया ॥33॥
शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरार्दनम्।
हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका ॥34॥
देवताओंको पीड़ा देनेवाले निशुम्भको शूल हाथमें लिये आते देख चण्डिकाने वेगसे चलाये हुए अपने शूलसे उसकी छाती छेद डाली ॥34॥
हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका ॥34॥
देवताओंको पीड़ा देनेवाले निशुम्भको शूल हाथमें लिये आते देख चण्डिकाने वेगसे चलाये हुए अपने शूलसे उसकी छाती छेद डाली ॥34॥
भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः।
महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन् ॥35॥
शूलसे विदीर्ण हो जानेपर उसकी छाती से एक दूसरा महाबली एवं महापराक्रमी पुरुष 'खड़ी रह, खड़ी रह' कहता हुआ निकला ॥35॥
महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन् ॥35॥
शूलसे विदीर्ण हो जानेपर उसकी छाती से एक दूसरा महाबली एवं महापराक्रमी पुरुष 'खड़ी रह, खड़ी रह' कहता हुआ निकला ॥35॥
तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः।
शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद्भुवि ॥36॥
उस निकलते हुए पुरुषकी बात सुनकर देवी ठठाकर हँस पड़ीं और खड्गसे उन्होंने उसका मस्तक काट डाला। फिर तो वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥36॥
शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद्भुवि ॥36॥
उस निकलते हुए पुरुषकी बात सुनकर देवी ठठाकर हँस पड़ीं और खड्गसे उन्होंने उसका मस्तक काट डाला। फिर तो वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥36॥
ततः सिंहश्चखादोग्रं* दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान्।
असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान् ॥37॥
तदनन्तर सिंह अपनी दाढ़ोंसे असुरोंकी गर्दन कुचलकर खाने लगा, यह बड़ा भयंकर दृश्य था। उधर काली तथा शिवदूतीने भी अन्यान्य दैत्योंका भक्षण आरम्भ किया ॥37॥
असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान् ॥37॥
तदनन्तर सिंह अपनी दाढ़ोंसे असुरोंकी गर्दन कुचलकर खाने लगा, यह बड़ा भयंकर दृश्य था। उधर काली तथा शिवदूतीने भी अन्यान्य दैत्योंका भक्षण आरम्भ किया ॥37॥
कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः।
ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः ॥38॥
कौमारी की शक्तिसे विदीर्ण होकर कितने ही महादैत्य नष्ट हो गये। ब्रह्माणी के मन्त्रपूत जलसे निस्तेज होकर कितने ही भाग खड़े हुए ॥38॥
ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः ॥38॥
कौमारी की शक्तिसे विदीर्ण होकर कितने ही महादैत्य नष्ट हो गये। ब्रह्माणी के मन्त्रपूत जलसे निस्तेज होकर कितने ही भाग खड़े हुए ॥38॥
माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे।
वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि ॥39॥
कितने ही दैत्य माहेश्वरी के त्रिशूलसे छिन्न-भिन्न हो धराशायी हो गये। वाराही के थूथुनके आघात से कितनोंका पृथ्वीपर कचूमर निकल गया ॥39॥
वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि ॥39॥
कितने ही दैत्य माहेश्वरी के त्रिशूलसे छिन्न-भिन्न हो धराशायी हो गये। वाराही के थूथुनके आघात से कितनोंका पृथ्वीपर कचूमर निकल गया ॥39॥