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SHRI DURGA SAPTSHATI

नवम अध्याय

NAVAM ADHYAY (Page 4)

दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा।

तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः ॥24॥

उस समय देवीने जब शुम्भको लक्ष्य करके कहा- 'ओ दुरात्मन्! खड़ा रह, खड़ा रह', तभी आकाशमें खड़े हुए देवता बोल उठे - 'जय हो, जय हो' ॥24॥
शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा।

आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया ॥25॥

शुम्भने वहाँ आकर ज्वालाओंसे युक्त अत्यन्त भयानक शक्ति चलायी। अग्निमय पर्वतके समान आती हुई उस शक्तिको देवीने बड़े भारी लूकेसे दूर हटा दिया ॥25॥
सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम्।

निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते ॥26॥

उस समय शुम्भके सिंहनादसे तीनों लोक गूँज उठे। राजन्! उसकी प्रतिध्वनिसे वज्रपातके समान भयानक शब्द हुआ, जिसने अन्य सब शब्दों को जीत लिया ॥26॥
शुम्भमुक्ताञ्छरान्देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान्।

चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥27॥

शुम्भके चलाये हुए बाणोंके देवीने और देवीके चलाये हुए बाणोंके शुम्भने अपने भयंकर बाणोंद्वारा सैकड़ों और हजारों टुकड़े कर दिये ॥27॥
ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम्।

स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह ॥28॥

तब क्रोधमें भरी हुई चण्डिकाने शुम्भको शूलसे मारा। उसके आघातसे मूर्च्छित हो वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥28॥
ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः।

आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा ॥29॥

इतने में ही निशुम्भको चेतना हुई और उसने धनुष हाथ में लेकर बाणोंद्वारा देवी, काली तथा सिंह को घायल कर डाला ॥29॥
पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः।

चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम् ॥30॥

फिर उस दैत्यराजने दस हजार बाँहें बनाकर चक्रोंके प्रहारसे चण्डिकाको आच्छादित कर दिया ॥30॥
ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी।

चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान् ॥31॥

तब दुर्गम पीड़ाका नाश करनेवाली भगवती दुर्गाने कुपित होकर अपने बाणोंसे उन चक्रों तथा बाणोंको काट गिराया ॥31॥

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