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SHRI DURGA SAPTSHATI

तृतीय अध्याय

TRITIYA ADHYAY (Page 2)

तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन।

ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥8॥

राजन्! देवी की बाँह पर पहुँचते ही वह तलवार टूट गयी, फिर तो क्रोध से लाल आँखें करके उस राक्षस ने शूल हाथ में लिया ॥8॥
चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः।

जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात् ॥9॥

और उसे उस महादैत्य ने भगवती भद्रकाली के ऊपर चलाया। वह शूल आकाश से गिरते हुये सूर्यमण्डल की भाँति अपने तेज से प्रज्वलित हो उठा ॥9॥
दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत।

तच्छूलं* शतधा तेन नीतं स च महासुरः ॥10॥

उस शूल को अपनी ओर आते देख देवी ने भी शूल का प्रहार किया। उससे राक्षस के शूल के सैकड़ों टुकड़े हो गये, साथ ही महादैत्य चिक्षुर की भी धज्ज्जियाँ उड़ गयीं। वह प्राणों से हाथ धो बैठा ॥10॥
हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ।

आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥11॥

महिषासुर के सेनापति उस महापराक्रमी चिक्षुर के मारे जाने पर देवताओं को पीड़ा देने वाला चामर हाथी पर चढ़कर आया। उसने भी देवी के ऊपर शक्ति का प्रहार किया, किन्तु जगदम्बा ने उसे अपने हुँकार से ही आहत एवं निष्प्रभ करके तत्काल पृथ्वीपर गिरा दिया ॥11-12॥
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम्।

हुंकाराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ॥12॥

महिषासुर के सेनापति उस महापराक्रमी चिक्षुर के मारे जाने पर देवताओं को पीड़ा देने वाला चामर हाथी पर चढ़कर आया। उसने भी देवी के ऊपर शक्ति का प्रहार किया, किन्तु जगदम्बा ने उसे अपने हुँकार से ही आहत एवं निष्प्रभ करके तत्काल पृथ्वीपर गिरा दिया ॥11-12॥
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः।

चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत् ॥13॥

शक्ति टूटकर गिरी हुयी देख चामर को बड़ा क्रोध हुआ। अब उसने शूल चलाया, किन्तु देवी ने उसे भी अपने बाणों द्वारा काट डाला ॥13॥
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः।

बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा ॥14॥

इतने में ही देवी का सिंह उछलकर हाथी के मस्तक पर चढ़ बैठा और उस दैत्य के साथ खूब जोर लगाकर बाहुयुद्ध करने लगा ॥14॥
युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ।

युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ॥15॥

वे दोनों लड़ते-लड़ते हाथी से पृथ्वी पर आ गये और अत्यन्त क्रोध मे भरकर एक-दूसरे पर बड़े भयङ्कर प्रहार करते हुये लड़ने लगे ॥15॥

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