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SHRI DURGA SAPTSHATI

तृतीय अध्याय

TRITIYA ADHYAY (Page 5)

करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च।

कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ॥32॥

तथा अपनी सूँड से देवी के विशाल सिंह को खींचने और गर्जने लगा। खींचते समय देवी ने तलवार से उसकी सूँड काट डाली ॥32॥
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः।

तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥33॥

तब उस महादैत्य ने पुनः भैंसे का शरीर धारण कर लिया और पहले की ही भाँति चराचर प्राणियों सहित तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा ॥33॥
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम्।

पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥34॥

तब क्रोध में भरी हुयी जगन्माता चण्डिका बारम्बार उत्तम मधु का पान करने और लाल आँखें करके हँसने लगीं ॥34॥
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः।

विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ॥35॥

उधर वह बल और पराक्रम के मद से उन्मत्त हुआ राक्षस गर्जने लगा और अपने सींगों से चण्डी के ऊपर पर्वतों को फेंकने लगा ॥35॥
सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः।

उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम् ॥36॥

उस समय देवी अपने बाणों के समूहों से उसके फेंके हुये पर्वतों को चूर्ण करती हुयी बोलीं। बोलते समय उनका मुख मधु के मद से लाल हो रहा था और वाणी लड़खड़ा रही थी ॥36॥
देव्युवाच ॥37॥

देवी ने कहा - ॥37॥
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्।

मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥38॥

ओ मूढ़! मैं जब तक मधु पीती हूँ, तब तक तू क्षण भर के लिये खूब गर्ज ले। मेरे हाथ से यहीं तेरी मृत्यु हो जाने पर अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे ॥38॥
ऋषिरुवाच ॥39॥

ऋषि कहते हैं - ॥39॥

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