ADVERTISEMENT
Invest Smart Ad

Right Ad Space

SHRI DURGA SAPTSHATI

तृतीय अध्याय

TRITIYA ADHYAY (Page 4)

निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः।

सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ॥24॥

इस प्रकार गणों की सेना को गिराकर वह असुर महादेवी के सिंह को मारने के लिये झपटा। इससे जगदम्बा को बड़ाक्रोध हुआ ॥24॥
सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः।

शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च ॥25॥

उधर महापराक्रमी महिषासुर भी क्रोध में भरकर धरती को खुरों से खोदने लगा तथा अपने सींगों से ऊँचे-ऊँचे पर्वतों को उठाकर फेंकने और गर्जने लगा ॥25॥
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत।

लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥26॥

उसके वेग से चक्कर देने के कारण पृथ्वी क्षुब्ध होकर फटने लगी। उसकी पूँछ से टकराकर समुद्र सब ओर से धरती को डुबोने लगा ॥26॥
धुतशृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं* खण्डं ययुर्घनाः।

श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ॥27॥

हिलते हुये सींगों के आघात से विदीर्ण होकर बादलों के टुकड़े-टुकड़े हो गये। उसके श्वास की प्रचण्ड वायु के वेग से उड़े हुये सैकड़ों पर्वत आकाश से गिरने लगे ॥27॥
इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम्।

दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत् ॥28॥

इस प्रकार क्रोध में भरे हुये उस महादैत्य को अपनी ओर आते देख चण्डिका ने उसका वध करने के लिये महान् क्रोध किया ॥28॥
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम्।

तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे ॥29॥

उन्होंने पाश फेंककर उस महान् असुर को बाँध लिया। उस महासंग्राम में बँध जाने पर उसने भैंसे का रूप त्याग दिया ॥29॥
ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः।

छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ॥30॥

और तत्काल सिंह के रूप में वह प्रकट हो गया। उस अवस्था में जगदम्बा ज्यों ही उसका मस्तक काटने के लिये उद्यत हुयीं, त्यों ही वह खड्गधारी पुरुष के रूप में दिखायी देने लगा ॥30॥
तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः।

तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः ॥31॥

तब देवी ने तुरन्त ही बाणों की वर्षा करके ढाल और तलवार के साथ उस पुरुष को बींध डाला। इतने में ही वह महान् गजराज के रूप में परिणत हो गया ॥31॥

© 2026 Durga Saptshati Pallabhav Technosoft. All Rights Reserved.