ADVERTISEMENT
Invest Smart Ad

Right Ad Space

SHRI DURGA SAPTSHATI

तृतीय अध्याय

TRITIYA ADHYAY (Page 6)

एवमुक्त्वा समुत्पत्य साऽऽरूढा तं महासुरम्।

पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥40॥

यों कहकर देवी उछलीं और उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गयीं। फिर अपने पैर से उसे दबाकर उन्होंने शूल से उसके कण्ठ में आघात किया ॥40॥
ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः।

अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्* देव्या वीर्येण संवृतः ॥41॥

उनके पैर से दबा होने पर भी महिषासुर अपने मुखसे [दूसरे रूप में बाहर होने लगा] अभी आधे शरीर से ही वह बाहर निकलने पाया थी कि देवी ने अपने प्रभाव से उसे रोक दिया ॥41॥
अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः।

तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः* ॥42॥

आधा निकला होने पर भी वह महादैत्य देवी से युद्ध करने लगा। तब देवी ने बहुत बड़ी तलवार से उसका मस्तक काट गिराया ॥42॥
ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत्।

प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः ॥43॥

फिर तो हाहाकार करती हुयी दैत्यों की सारी सेना भाग गयी तथा सम्पूर्ण देवता अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥43॥
तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः।

जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ॐ ॥44॥

देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ दुर्गा देवी का स्तवन किया। गन्धर्वराज गाने लगे तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥44॥

© 2026 Durga Saptshati Pallabhav Technosoft. All Rights Reserved.