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SHRI DURGA SAPTSHATI

तृतीय अध्याय

TRITIYA ADHYAY (Page 3)

ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा।

करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम् ॥16॥

तदनन्तर सिंह बड़े वेग से आकाश की ओर उछला और उधर से गिरते समय उसने पंजों की मार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया ॥16॥
उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः।

दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः ॥17॥

इसी प्रकार उदग्र भी शिला और वक्ष आदि की मार खाकर रणभूमि में देवी के हाथ से मारा गया तथा कराल भी दाँतों, मुक्कों और थप्पड़ों की चोट से धराशयी हो गया ॥17॥
देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम्।

बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम् ॥18॥

क्रोध में भरी हुयी देवी ने गदा की चोट से उद्धत का कचूमर निकाल डाला। भिन्दिपाल से वाष्कल को तथा बाणों से ताम्र और अन्धक को मौत के घाट उतार दिया ॥18॥
उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम्।

त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥19॥

तीन नेत्रों वाली परमेश्वरी ने त्रिशूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु नामक दैत्यों को मार डाला ॥19॥
बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः।

दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम्* ॥20॥

तलवार की चोट से विडाल के मस्तक को धड़ से काट गिराया। दुर्धर और दुर्मुख - इन दोनों को भी अपने बाणों से यमलोक भेज दिया ॥20॥
एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः।

माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥21॥

इस प्रकार अपनी सेना का संहार होता देख महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण करके देवी के गणों को त्रास देना आरम्भ किया ॥21॥
कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान्।

लाङ्गूलताडितांश्चान्याञ्छृङ्गाभ्यां च विदारितान् ॥22॥

किन्हीं को थूथुन से मारकर, किन्हीं के ऊपर खुरों का प्रहार करके, किन्हीं-किन्हीं को पूँछ से चोट पहुँचाकर, कुछ को सींगों से विदीर्ण करके, कुछ गणों को वेग से, किन्हीं को सिंहनाद से, कुछ को चक्कर देकर और कितनों को निःश्वास- वायु के झोंके से धराशयी कर दिया ॥22-23॥
वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च।

निःश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले ॥23॥

किन्हीं को थूथुन से मारकर, किन्हीं के ऊपर खुरों का प्रहार करके, किन्हीं-किन्हीं को पूँछ से चोट पहुँचाकर, कुछ को सींगों से विदीर्ण करके, कुछ गणों को वेग से, किन्हीं को सिंहनाद से, कुछ को चक्कर देकर और कितनों को निःश्वास- वायु के झोंके से धराशयी कर दिया ॥22-23॥

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