स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि।
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥7॥
उस दुरात्मा महिष ने समस्त देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया है। अब वे मनुष्यों की भाँति पृथ्वी पर विचरते हैं ॥7॥
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥7॥
उस दुरात्मा महिष ने समस्त देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया है। अब वे मनुष्यों की भाँति पृथ्वी पर विचरते हैं ॥7॥
एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम्।
शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥8॥
दैत्यों की यह सारी करतूत हमने आप लोगों से कह सुनायी। अब हम आपकी शरण में आये हैं। उसके वध का कोई उपाय सोचिये' ॥8॥
शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥8॥
दैत्यों की यह सारी करतूत हमने आप लोगों से कह सुनायी। अब हम आपकी शरण में आये हैं। उसके वध का कोई उपाय सोचिये' ॥8॥
इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः।
चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ ॥9॥
इस प्रकार देवताओं के वचन सुनकर भगवान् विष्णु और शिव ने दैत्यों पर बड़ा क्रोध किया। उनकी भौंहे तन गयीं और मुँह टेढ़ा हो गया ॥9॥
चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ ॥9॥
इस प्रकार देवताओं के वचन सुनकर भगवान् विष्णु और शिव ने दैत्यों पर बड़ा क्रोध किया। उनकी भौंहे तन गयीं और मुँह टेढ़ा हो गया ॥9॥
ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः।
निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शङ्करस्य च ॥10॥
तब अत्यन्त कोप में भरे हुये चक्रपाणि श्रीविष्णु के मुख से एक महान् तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा, शङ्कर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओं के शरीर से भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब मिलकर एक हो गया ॥10-11॥
निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शङ्करस्य च ॥10॥
तब अत्यन्त कोप में भरे हुये चक्रपाणि श्रीविष्णु के मुख से एक महान् तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा, शङ्कर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओं के शरीर से भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब मिलकर एक हो गया ॥10-11॥
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥11॥
तब अत्यन्त कोप में भरे हुये चक्रपाणि श्रीविष्णु के मुख से एक महान् तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा, शङ्कर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओं के शरीर से भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब मिलकर एक हो गया ॥10-11॥
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥11॥
तब अत्यन्त कोप में भरे हुये चक्रपाणि श्रीविष्णु के मुख से एक महान् तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा, शङ्कर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओं के शरीर से भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब मिलकर एक हो गया ॥10-11॥
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम्।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥12॥
महान् तेज का वह पुञ्ज जाज्वल्यमान पर्वत-सा जान पड़ा। देवताओं ने देखा, वहाँ उसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त हो रही थीं ॥12॥
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥12॥
महान् तेज का वह पुञ्ज जाज्वल्यमान पर्वत-सा जान पड़ा। देवताओं ने देखा, वहाँ उसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त हो रही थीं ॥12॥
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥13॥
सम्पूर्ण देवताओं के शरीर से प्रकट हुये उस तेज की कहीं तुलना नहीं थी। एकत्रित होने पर वह एक नारी के रूप में परिणत हो गया और अपने प्रकाश से तीनों लोकों में व्याप्त जान पड़ा ॥13॥
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥13॥
सम्पूर्ण देवताओं के शरीर से प्रकट हुये उस तेज की कहीं तुलना नहीं थी। एकत्रित होने पर वह एक नारी के रूप में परिणत हो गया और अपने प्रकाश से तीनों लोकों में व्याप्त जान पड़ा ॥13॥
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम्।
याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥14॥
भगवान् शङ्कर का जो तेज था, उससे उस देवी का मुख प्रकट हुआ। यमराज के तेज से उसके सिर में बाल निकल आये। श्रीविष्णुभगवान् के तेज से उसकी भुजाएँ उत्पन्न हुयीं ॥14॥
याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥14॥
भगवान् शङ्कर का जो तेज था, उससे उस देवी का मुख प्रकट हुआ। यमराज के तेज से उसके सिर में बाल निकल आये। श्रीविष्णुभगवान् के तेज से उसकी भुजाएँ उत्पन्न हुयीं ॥14॥