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SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वितीय अध्याय

DVITIYA ADHYAY (Page 1)

विनियोग

ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिः,महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः,

शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्,वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्,

श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः।
भावार्थ:

ध्यानम्

ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां

दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।

शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां

सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्
ध्यान:
॥ श्रीदुर्गासप्तशती - द्वितीयोऽध्यायः ॥
देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध

॥ विनियोगः ॥
ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिः,महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः,

शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्,वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्,

श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः।

॥ ध्यानम् ॥
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां

दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।

शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां

सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥

"ॐ ह्रीं" ऋषिरुवाच ॥1॥

॥ द्वितीयोऽध्यायः ॥
देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध

॥ विनियोग ॥
ॐ मध्यम चरित्र के विष्णु ऋषि, महालक्ष्मी देवता, उष्णिक् छन्द, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीज, वायु तत्त्व और यजुर्वेद स्वरूप है। श्रीमहालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिये मध्यम चरित्र के पाठ में इसका विनियोग है।

॥ ध्यान ॥
मैं कमल के आसन पर बैठी हुयी प्रसन्न मुख वाली महिषासुरमर्दिनी भगवती महालक्ष्मी का भजन करता हूँ, जो अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शङ्ख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और चक्र धारण करती हैं।

ऋषि कहते हैं - ॥1॥
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा।

महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे ॥2॥

॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥2॥

पूर्वकाल में देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्षों तक घोर संग्राम हुआ था। उसमें असुरों का स्वामी महिषासुर था और देवताओं के नायक इन्द्र थे। उस युद्ध में देवताओं की सेना महाबली असुरों से परास्त हो गयी। सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर महिषासुर इन्द्र बन बैठा ॥2-3॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवी माहात्म्य
में 'महिषासुर की सेना का वध' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥2॥
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम्।

जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः ॥3॥

पूर्वकाल में देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्षों तक घोर संग्राम हुआ था। उसमें असुरों का स्वामी महिषासुर था और देवताओं के नायक इन्द्र थे। उस युद्ध में देवताओं की सेना महाबली असुरों से परास्त हो गयी। सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर महिषासुर इन्द्र बन बैठा ॥2-3॥
ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम्।

पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ॥4॥

तब पराजित देवता प्रजापति ब्रह्माजी को आगे करके उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् शङ्कर और विष्णु विराजमान थे ॥4॥
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम्।

त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥5॥

देवताओं ने महिषासुर के पराक्रम तथा अपनी पराजय का यथावत् वृतान्त उन दोनों देवेश्वरों से विस्तार पूर्वक कह सुनाया ॥5॥
सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च।

अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति ॥6॥

वे बोले- 'भगवन्! महिषासुर सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य देवताओं के भी अधिकार छीनकर स्वयं ही सबका अधिष्ठाता बना बैठा है ॥6॥

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