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SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वितीय अध्याय

DVITIYA ADHYAY (Page 8)

मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे।

ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः* ॥55॥

उस संग्राम-महोत्सव में कितने ही गण मृदङ्ग बजा रहे थे। तदनन्तर देवी ने त्रिशूल से, गदा से, शक्ति की वर्षा से और खड्ग आदि से सैकड़ों महादैत्यों का संहार कर डाला। कितनों को घण्टे के भयङ्कर नाद से मूर्च्छित करके मार गिराया ॥55-56॥
खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान्।

पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् ॥56॥

उस संग्राम-महोत्सव में कितने ही गण मृदङ्ग बजा रहे थे। तदनन्तर देवी ने त्रिशूल से, गदा से, शक्ति की वर्षा से और खड्ग आदि से सैकड़ों महादैत्यों का संहार कर डाला। कितनों को घण्टे के भयङ्कर नाद से मूर्च्छित करके मार गिराया ॥55-56॥
असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत्।

केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे ॥57॥

बहुतेरे दैत्यों को पाश से बाँधकर धरती पर घसीटा। कितने ही दैत्य उनकी तीखी तलवार की मार से दो-दो टुकड़े हो गये ॥57॥
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते।

वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः ॥58॥

कितने ही गदा की चोट से घायल हो धरती पर सो गये। कितने ही मूसल की मार से अत्यन्त आहत होकर रक्त वमन करने लगे। कुछ दैत्य शूल से छाती फट जाने के कारण पृथ्वी पर ढ़ेर हो गये। उस रणाङ्गन में बाणसमूहों की वृष्टि से कितने ही असुरों की कमर टूट गयी ॥58-59॥
केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि।

निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे ॥59॥

कितने ही गदा की चोट से घायल हो धरती पर सो गये। कितने ही मूसल की मार से अत्यन्त आहत होकर रक्त वमन करने लगे। कुछ दैत्य शूल से छाती फट जाने के कारण पृथ्वी पर ढ़ेर हो गये। उस रणाङ्गन में बाणसमूहों की वृष्टि से कितने ही असुरों की कमर टूट गयी ॥58-59॥
श्ये*नानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः।

केषाञ्चिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ॥60॥

बाज की तरह झपटने वाले देव पीड़क दैत्यगण अपने प्राणों से हाथ धोने लगे। किन्हीं की बाँहें छिन्न-भिन्न हो गयीं। कितनों की गर्दनें कट गयीं। कितने ही दैत्यों के मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। कुछ लोगों के शरीर मध्यभाग में ही विदीर्ण हो गये। कितने ही महादैत्य जाँघें कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़े। कितनों को ही देवी ने एक बाँह, एक पैर और एक नेत्र वाले करके दो टुकड़ों में चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट जाने पर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल धड़ के ही रूप में अच्छे-अच्छे हथियार हाथ में ले देवी के साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध युद्ध के बाजों की लयपर नाचते थे ॥60-63॥
शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः।

विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः ॥61॥

बाज की तरह झपटने वाले देव पीड़क दैत्यगण अपने प्राणों से हाथ धोने लगे। किन्हीं की बाँहें छिन्न-भिन्न हो गयीं। कितनों की गर्दनें कट गयीं। कितने ही दैत्यों के मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। कुछ लोगों के शरीर मध्यभाग में ही विदीर्ण हो गये। कितने ही महादैत्य जाँघें कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़े। कितनों को ही देवी ने एक बाँह, एक पैर और एक नेत्र वाले करके दो टुकड़ों में चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट जाने पर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल धड़ के ही रूप में अच्छे-अच्छे हथियार हाथ में ले देवी के साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध युद्ध के बाजों की लयपर नाचते थे ॥60-63॥
एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः।

छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः ॥62॥

बाज की तरह झपटने वाले देव पीड़क दैत्यगण अपने प्राणों से हाथ धोने लगे। किन्हीं की बाँहें छिन्न-भिन्न हो गयीं। कितनों की गर्दनें कट गयीं। कितने ही दैत्यों के मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। कुछ लोगों के शरीर मध्यभाग में ही विदीर्ण हो गये। कितने ही महादैत्य जाँघें कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़े। कितनों को ही देवी ने एक बाँह, एक पैर और एक नेत्र वाले करके दो टुकड़ों में चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट जाने पर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल धड़ के ही रूप में अच्छे-अच्छे हथियार हाथ में ले देवी के साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध युद्ध के बाजों की लयपर नाचते थे ॥60-63॥

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