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SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वितीय अध्याय

DVITIYA ADHYAY (Page 3)

सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत्।

वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥15॥

चन्द्रमा के तेज से दोनों स्तनों का और इन्द्र के तेज से मध्यभाग (कटिप्रदेश) - का प्रादुर्भाव हुआ। वरुण के तेज से जङ्घा और पिण्डली तथा पृथ्वी के तेज से नितम्ब भाग प्रकट हुआ ॥15॥
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा।

वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥16॥

ब्रह्मा के तेज से दोनों चरण और सूर्य के तेज से उसकी अँगुलियाँ हुयीं। वसुओं के तेज से हाथों की अँगुलियाँ और कुबेर के तेज से नासिका प्रकट हुयी ॥16॥
तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा।

नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥17॥

उस देवी के दाँत प्रजापति के तेज से और तीनों नेत्र अग्नि के तेज से प्रकट हुये थे ॥17॥
भ्रुवौ च सन्ध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च।

अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥18॥

उसकी भौंहे सन्ध्या के और कान वायु के तेज से उत्पन्न हुये थे। इसी प्रकार अन्यान्य देवताओं के तेज से भी उस कल्याणमयी देवी का आविर्भाव हुआ ॥18॥
ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम्।

तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः* ॥19॥

तदन्तर समस्त देवताओं के तेजःपुञ्ज से प्रकट हुयी देवी को देखकर महिषासुर के सताये हुये देवता बहुत प्रसन्न हुये ॥19॥
शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक्।

चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य* स्वचक्रतः ॥20॥

पिनाकधारी भगवान् शङ्कर ने अपने शूल से एक शूल निकालकर उन्हें दिया; फिर भगवान् विष्णु ने भी अपने चक्र से चक्र उत्पन्न करके भगवती को अर्पण किया ॥20॥
शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः।

मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥21॥

वरुण ने भी शङ्ख भेंट किया, अग्नि ने उन्हें शक्ति दी और वायु ने धनुष तथा बाण से भरे हुये दो तरकस प्रदान किये ॥21॥
वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य* कुलिशादमराधिपः।

ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥22॥

सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र ने अपने वज्र से वज्र उत्पन्न करके दिया और ऐरावत हाथी से उतारकर एक घण्टा भी प्रदान किया ॥22॥

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