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SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वितीय अध्याय

DVITIYA ADHYAY (Page 9)

कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः।

ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः ॥63॥

बाज की तरह झपटने वाले देव पीड़क दैत्यगण अपने प्राणों से हाथ धोने लगे। किन्हीं की बाँहें छिन्न-भिन्न हो गयीं। कितनों की गर्दनें कट गयीं। कितने ही दैत्यों के मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। कुछ लोगों के शरीर मध्यभाग में ही विदीर्ण हो गये। कितने ही महादैत्य जाँघें कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़े। कितनों को ही देवी ने एक बाँह, एक पैर और एक नेत्र वाले करके दो टुकड़ों में चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट जाने पर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल धड़ के ही रूप में अच्छे-अच्छे हथियार हाथ में ले देवी के साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध युद्ध के बाजों की लयपर नाचते थे ॥60-63॥
कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः।

तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः* ॥64॥

कितने ही बिना सिर के धड़- हाथों में खड्ग, शक्ति और ऋष्टि लिये दौड़ते थे तथा दूसरे-दूसरे महादैत्य 'ठहरो! ठहरो!!' यह कहते हुये देवी को युद्ध के लिये ललकारते थे। जहाँ वह घोर संग्राम हुआ था, वहाँ की धरती देवी के गिराये हुये रथ, हाथी, घोड़े और असुरों की लाशों से ऐसी पट गयी थी कि, वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया था ॥64-65॥
पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा।

अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः ॥65॥

कितने ही बिना सिर के धड़- हाथों में खड्ग, शक्ति और ऋष्टि लिये दौड़ते थे तथा दूसरे-दूसरे महादैत्य 'ठहरो! ठहरो!!' यह कहते हुये देवी को युद्ध के लिये ललकारते थे। जहाँ वह घोर संग्राम हुआ था, वहाँ की धरती देवी के गिराये हुये रथ, हाथी, घोड़े और असुरों की लाशों से ऐसी पट गयी थी कि, वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया था ॥64-65॥
शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः।

मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥66॥

दैत्यों की सेना में हाथी,घोड़े और असुरों के शरीरों से इतनी अधिक मात्रा में रक्तपात हुआ था कि थोड़ी देर में वहाँ खून की बड़ी-बड़ी नदियाँ बहने लगीं ॥66॥
क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका।

निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ॥67॥

जगदम्बा ने असुरों की विशाल सेना को क्षणभर में नष्ट कर दिया- ठीक उसी तरह, जैसे तृण और काठ के भारी ढ़ेर को आग कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है ॥67॥
स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेसरः।

शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥68॥

और वह सिंह भी गर्दन के बालों को हिला-हिलाकर जोर-जोर से गर्जना करता हुआ दैत्यों के शरीर से मानो उनके प्राण चुन लेता था ॥68॥
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः।

यथैषां* तुतुषुर्देवाः* पुष्पवृष्टिमुचो दिवि॥ॐ ॥69॥

वहाँ देवी के गणों ने भी उन महादैत्यों के साथ ऐसा युद्ध किया, जिससे आकाश में खड़े हुये देवतागण उनपर बहुत सन्तुष्ट हुये और फूल बरसाने लगे ॥69॥

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