ADVERTISEMENT
Invest Smart Ad

Right Ad Space

SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वितीय अध्याय

DVITIYA ADHYAY (Page 5)

नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम्।

अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ॥31॥

धनाध्यक्ष कुबेर ने मधु से भरा पानपात्र दिया तथा सम्पूर्ण नागों के राजा शेष ने, जो इस पृथ्वी को धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार भेंट दिया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर देवी का सम्मान किया। तत्पश्चात् उन्होंने बारम्बार अट्टहासपूर्वक उच्चस्वर से गर्जना की। उनके भयङ्कर नाद से सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा ॥30-32॥
सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः।

तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः ॥32॥

धनाध्यक्ष कुबेर ने मधु से भरा पानपात्र दिया तथा सम्पूर्ण नागों के राजा शेष ने, जो इस पृथ्वी को धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार भेंट दिया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर देवी का सम्मान किया। तत्पश्चात् उन्होंने बारम्बार अट्टहासपूर्वक उच्चस्वर से गर्जना की। उनके भयङ्कर नाद से सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा ॥30-32॥
अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत्।

चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे ॥33॥

देवी का वह अत्यन्त उच्चस्वर से किया हुआ सिंहनाद कहीं समा न सका, आकाश उसके सामने लघु प्रतीत होने लगा। उससे बड़े जोर की प्रतिध्वनि हुयी, जिससे सम्पूर्ण विश्व में हलचल मच गयी और समुद्र काँप उठे ॥33॥
चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः।

जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम्* ॥34॥

पृथ्वी डोलने लगी और समस्त पर्वत हिलने लगे। उस समय देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्नता के साथ सिंहवाहिनी भवानी से कहा- 'देवि! तुम्हारी जय हो' ॥34॥
तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः।

दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः ॥35॥

सम्पूर्ण त्रिलोकी को क्षोभग्रस्त देख दैत्यगण अपनी समस्त सेना को कवच आदि से सुसज्जित कर, हाथों में हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो गये। उस समय महिषासुर ने बड़े क्रोधमें आकर कहा- 'आः! यह क्या हो रहा है?' फिर वह सम्पूर्ण असुरों से घिरकर उस सिंहनाद की ओर लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने देवी को देखा, जो अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं ॥35-37॥
सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः।

आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः ॥36॥

सम्पूर्ण त्रिलोकी को क्षोभग्रस्त देख दैत्यगण अपनी समस्त सेना को कवच आदि से सुसज्जित कर, हाथों में हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो गये। उस समय महिषासुर ने बड़े क्रोधमें आकर कहा- 'आः! यह क्या हो रहा है?' फिर वह सम्पूर्ण असुरों से घिरकर उस सिंहनाद की ओर लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने देवी को देखा, जो अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं ॥35-37॥
अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः।

स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा ॥37॥

सम्पूर्ण त्रिलोकी को क्षोभग्रस्त देख दैत्यगण अपनी समस्त सेना को कवच आदि से सुसज्जित कर, हाथों में हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो गये। उस समय महिषासुर ने बड़े क्रोधमें आकर कहा- 'आः! यह क्या हो रहा है?' फिर वह सम्पूर्ण असुरों से घिरकर उस सिंहनाद की ओर लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने देवी को देखा, जो अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं ॥35-37॥
पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम्।

क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम् ॥38॥

साथ ही महर्षियों ने भक्ति भाव से विनम्र होकर उनका स्तवन किया। उनके चरणों के भार से पृथ्वी दबी जा रही थी। माथे के मुकुट से आकाश में रेखा- सी खींच रही थी तथा वे अपने धनुष की टङ्कार से सातों पातालों को क्षुब्ध किये देती थीं ॥38॥

© 2026 Durga Saptshati Pallabhav Technosoft. All Rights Reserved.