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SHRI DURGA SAPTSHATI

द्वितीय अध्याय

DVITIYA ADHYAY (Page 4)

कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ।

प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥23॥

यमराज ने काल दण्ड से दण्ड, वरुण ने पाश, प्रजापति ने स्फटिकाक्ष की माला तथा ब्रह्माजी ने कमण्डलु भेंट किया ॥23॥
समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः।

कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म* च निर्मलम् ॥24॥

सूर्य ने देवी के समस्त रोम-कूपों में अपनी किरणों का तेज भर दिया। काल ने उन्हें चमकती हुयी ढाल और तलवार दी ॥24॥
क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे।

चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥25॥

क्षीरसमुद्र ने उज्ज्वल हार तथा कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ ही उन्होंने दिव्य चूड़ामाणि, दो कुण्डल, कड़े, उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सब बाहुओं के लिये केयुर, दोनों चरणों के लिये नूपुर, गले की सुन्दर हँसली और सब अँगुलियों में पहनने के लिये रत्नों की बनी अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यन्त निर्मल फरसा भेंट किया ॥25-27॥
अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु।

नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ॥26॥

क्षीरसमुद्र ने उज्ज्वल हार तथा कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ ही उन्होंने दिव्य चूड़ामाणि, दो कुण्डल, कड़े, उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सब बाहुओं के लिये केयुर, दोनों चरणों के लिये नूपुर, गले की सुन्दर हँसली और सब अँगुलियों में पहनने के लिये रत्नों की बनी अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यन्त निर्मल फरसा भेंट किया ॥25-27॥
अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च।

विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ॥27॥

क्षीरसमुद्र ने उज्ज्वल हार तथा कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ ही उन्होंने दिव्य चूड़ामाणि, दो कुण्डल, कड़े, उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सब बाहुओं के लिये केयुर, दोनों चरणों के लिये नूपुर, गले की सुन्दर हँसली और सब अँगुलियों में पहनने के लिये रत्नों की बनी अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यन्त निर्मल फरसा भेंट किया ॥25-27॥
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्।

अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ॥28॥

साथ ही अनेक प्रकार के अस्त्र और अभेद्य कवच दिये; इनके सिवा मस्तक और वक्षःस्थल पर धारण करने के लिये कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की मालाएँ दीं ॥28॥
अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम्।

हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ॥29॥

जलधि ने उन्हें सुन्दर कमल का फूल भेंट किया। हिमालय ने सवारी के लिये सिंह तथा भाँति-भाँति के रत्न समर्पित किये ॥29॥
ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः।

शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ॥30॥

धनाध्यक्ष कुबेर ने मधु से भरा पानपात्र दिया तथा सम्पूर्ण नागों के राजा शेष ने, जो इस पृथ्वी को धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार भेंट दिया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर देवी का सम्मान किया। तत्पश्चात् उन्होंने बारम्बार अट्टहासपूर्वक उच्चस्वर से गर्जना की। उनके भयङ्कर नाद से सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा ॥30-32॥

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