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SHRI DURGA SAPTSHATI

प्रथम अध्याय

PRATHAM ADHYAY (Page 13)

उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम् ॥95॥

राजन्! जब ब्रह्माजी ने वहाँ मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से भगवान् विष्णु को जगाने के लिये तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा की इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान् के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्षःस्थल से निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रा से मुक्त होने परजगत् के स्वामी भगवान् जनार्दन उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्यासे जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी थे और क्रोध से लाल आँखें किये ब्रह्माजी को खा जाने के लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान् श्रीहरि ने उठकर उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था; इसीलिये वे भगवान् विष्णु से कहने लगे- "हम तुम्हारी वीरता से सन्तुष्ट हैं। तुम हम लोगों से कोई वर माँगों" ॥89-95॥
श्रीभगवानुवाच ॥96॥

श्रीभगवान् बोले - ॥96॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ॥97॥

यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है ॥97-98॥
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम* ॥98॥

यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है ॥97-98॥
ऋषिरुवाच ॥99॥

ऋषि कहते हैं - ॥99॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ॥100॥

इस प्रकार धोखे में आ जाने पर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत् में जल-ही-जल देखा, तब कमलनयन भगवान् से कहा- 'जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुयी न हो- जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो' ॥100-101॥
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः*।

आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥101॥

इस प्रकार धोखे में आ जाने पर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत् में जल-ही-जल देखा, तब कमलनयन भगवान् से कहा- 'जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुयी न हो- जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो' ॥100-101॥
ऋषिरुवाच ॥102॥

ऋषि कहते हैं - ॥102॥

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