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SHRI DURGA SAPTSHATI

प्रथम अध्याय

PRATHAM ADHYAY (Page 5)

किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः।

यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ॥31॥

किन्तु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलाञ्जलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है। महामते! गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेम मग्न हो रहा है, यह क्या है - इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसे ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है ॥31-33॥
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः।

किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥32॥

किन्तु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलाञ्जलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है। महामते! गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेम मग्न हो रहा है, यह क्या है - इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसे ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है ॥31-33॥
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु।

तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥33॥

किन्तु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलाञ्जलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है। महामते! गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेम मग्न हो रहा है, यह क्या है - इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसे ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है ॥31-33॥
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥34॥

उन लोगों में प्रेम का सर्वथा अभाव है; तो भी उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नही हो पाता, इसके लिये क्या करूँ? ॥34॥
मार्कण्डेय उवाच ॥35॥

मार्कण्डेय जी कहते हैं - ॥35॥
ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ॥36॥

ब्रह्मन्! तदनन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनिकी सेवा में उपस्थित हुये और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरम्भ किया ॥36-38॥
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः।

कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् ॥37॥

ब्रह्मन्! तदनन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनिकी सेवा में उपस्थित हुये और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरम्भ किया ॥36-38॥
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥38॥

ब्रह्मन्! तदनन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनिकी सेवा में उपस्थित हुये और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरम्भ किया ॥36-38॥

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