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SHRI DURGA SAPTSHATI

प्रथम अध्याय

PRATHAM ADHYAY (Page 14)

तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता।

कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥103॥

तब 'तथास्तु' कहकर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् ने उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजी की सतुति करने पर स्वयं प्रकट हुयी थीं। अब पुनः तुमसे उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ, सुनो ॥103-104॥
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्।

प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः श्रृणु वदामि ते॥ ऐं ॐ ॥104॥

तब 'तथास्तु' कहकर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् ने उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजी की सतुति करने पर स्वयं प्रकट हुयी थीं। अब पुनः तुमसे उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ, सुनो ॥103-104॥

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